Sunday, August 14, 2016

भाषण में इन बातों का ख़्याल रखिएगा मोदी जी


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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 अगस्त, 2016 को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले से तीसरी बार राष्ट्र को संबोधित करने वाले हैं.
यूँ तो लाल किले से प्रधानमंत्री के संबोधन पर देश की नज़रें टिकी रहती हैं, लेकिन नरेंद्र मोदी की बात दूसरी है. वे हर महीने ऑल इंडिया रेडियो से ‘मन की बात’ करते हैं. इसके अलावा हाल ही में उन्होंने 'टाउनहॉल' का कॉन्सेप्ट भी शुरू किया है.
ऐसे में उनके सामने कुछ नया बोलने की चुनौती होगी. एक चुनौती ये भी होगी कि वे भाषण में जो कुछ भी बोलते हैं, उस पर कितना अमल होता है, क्योंकि ऐसे कई मौके आए जब उनके बयान जुमलेबाजी से जोड़कर देखे गए हैं.
इसी कसौटी पर बीते साल यानी 15 अगस्त, 2015 को लाल किले से दिए मोदी के संबोधनों को वास्तविकता के आईने से भी देख लीजिए.
पहला; सांप्रदायिक सद्भाव पर ज़ोर

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“हमारी एकता, हमारी सरलता, हमारा भाईचारा और हमारा सद्भाव ये हमारी बहुत बड़ी पूंजी है. इस पूंजी को कभी दाग़ नहीं लगना चाहिए. कभी चोट नहीं पहुँचनी चाहिए. अगर देश की एकता बिखर जाए तो सपने भी चूरचूर हो जाते हैं. जातिवाद के ज़हर को, सांप्रदायिकतावाद के जुनून को किसी भी रूप में जगह नहीं देनी है, पनपने नहीं देना है.”
क्या है तस्वीर: राष्ट्रीय राजधानी से सटे दादरी में मुसलमान अखलाक़ की भीड़ द्वारा हत्या. अखलाक़ पर गोमांस रखने का आरोप. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कैराना को स्थानीय बीजेपी सासंद द्वारा सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश. आंध्र प्रदेश में दलित युवक रोहित वेमुला को आत्महत्या करने पर मज़बूर किया गया. जम्मू-कश्मीर में हिंसा. गुजरात के उना में कथित गौरक्षकों द्वारा दलितों के साथ मारपीट.
दूसरा; टीम इंडिया से बढ़ रहा है देश

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“सवा सौ करोड़ देशवासी जब टीम बन जाते हैं तो वो राष्ट्र को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाते हैं, राष्ट्र को बढ़ाते हैं, राष्ट्र को बनाते हैं और राष्ट्र को बचाते भी हैं. हम जो कुछ भी कर रहे हैं, जहां भी पहुँचने का प्रयास कर रहे हैं वह इस सवा सौ करोड़ की टीम इंडिया के कारण ही है. हम टीम इंडिया के आभारी हैं.”
क्या है तस्वीर: पहले उत्तर प्रदेश के दादरी और फिर कैराना की घटना से कथित तौर पर अल्पसंख्यक तबके में असुरक्षा. गुजरात में दलितों के साथ मारपीट की घटना के बाद दलित समुदाय का आक्रोश प्रदर्शन. टीम इंडिया में इन दोनों समुदाय की आबादी 30 फ़ीसदी से ज़्यादा है. ऐसे में सवाल यही उठता है कि क्या टीम इंडिया, 30 फ़ीसदी खिलाड़ियों के बिना ही काम कर रही है?
तीसरा; जन धन योजना, बीमा योजना एंव पेंशन योजना
“विश्व में फाइनेंसियल इंक्लूज़न की जो बात होती है उसे एक मज़बूत धरातल पर अगर लाना है तो देश के ग़रीब से ग़रीब व्यक्ति को अर्थव्यवस्था से जोड़ना है. हमने जनधन योजना का कार्य समय सीमा में पूरा किया. 17 करोड़ लोगों ने प्रधानमंत्री जनधन योजना के अंतर्गत खाते खुलवाए. 12 रुपए सालाना में दो लाख का बीमा दिया.”

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क्या है तस्वीर: प्रधानमंत्री जन धन योजना की वेबसाइट के मुताबिक अबतक 23.62 करोड़ खाते खोले गए. इन खातों में 41,723.30 करोड़ रुपए जमा भी हुए हैं. 9.46 करोड़ सुरक्षा बीमा पॉलिसी और 2.98 करोड़ जीवन ज्योति बीमा योजना शुरू की गई है.
ये आंकड़े पूरी कहानी नहीं बताते हैं. वेबसाइट ये भी बताती है कि इन खातों में 24 फ़ीसदी खातों में कोई पैसा जमा नहीं है. बिजनेस चैनल सीएनबीसी की पहली अप्रैल, 2016 तक की गई पड़ताल के मुताबिक केवल 558 लोगों ने दुर्घटना बीमा का दावा किया और उसमें 40 फ़ीसदी लोगों के दावे निरस्त हो गए. इन खातों के जरिए मिलने वाले ओवरड्राफ्ट की स्थिति और भी दयनीय है.
जितने खाते खुले हैं उनमें केवल 67,50,764 खातों को ओवरड्रॉफ्ट के लायक पाया गया है. ओवरड्राफ्ट का मतलब यह है कि खाताधारक जरूरत पड़ने पर पांच हज़ार रुपए तक निकाल सकता है, भले उसके खाते में इतने रुपये हों या नहीं हों.
चौथा; विद्यालयों में शौचालय
“हमने दो लाख विद्यालयों में सवा चार लाख शौचालय बनाने के काम को लगभग पूरा कर लिया.”

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क्या है तस्वीर: हैदराबाद यूनिवर्सिटी में दलित छात्र रोहित वेमुला प्रकरण पर सरकार घिरी, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र नेता कन्हैया कुमार की गिरफ़्तारी पर भी सवाल. इन सबके केंद्र में रहीं मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी का मंत्रालय बदला गया.
इन सबके बीच सरकार ने शिक्षा का बजट करीब 17 फ़ीसदी घटाया. सर्वशिक्षा अभियान का बजट करीब 23 फ़ीसदी कम किया गया. मिड डे मील योजना का पैसा करीब 16 फ़ीसदी कम किया गया.
पाँचवां; श्रम क़ानूनों में सुधार
“मज़दूरों को पीएफ़ खाते के लिए एक पहचान नंबर दिया. 44 श्रम क़ानूनों को चार आचार संहिताओं में समेटा.”
क्या है तस्वीर: भारत सरकार के श्रम ब्यूरो के मुताबिक आठ श्रम आधारित उद्योग धंधों में नई नौकरियां पिछले छह साल में सबसे कम रहीं. जनवरी-अक्टूबर, 2015 के आंकड़ों के मुताबिक इन उद्योग धंधों में नई नौकरियां लगातार घट रही हैं.
छठा; भ्रष्टाचार नहीं हुआ

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“हमारी पंद्रह महीनों की सरकार पर अब तक भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है. कालेधन पर हमने कठोर क़ानून बनाया है और लोगों ने अब तक 6500 करोड़ रुपए की अघोषित आय घोषित की है.”
क्या है तस्वीर: इस मामले में मोदी अपनी पीठ थपथपा सकते हैं कि उनके सरकार और उनके मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के बड़े आरोप अब तक नहीं लगे हैं. हालाँकि विदेशों में जमा कालेधन पर सरकार को ख़ास सफलता नहीं मिली है.
सातवां; स्टार्ट अप इंडिया-स्टैंड अप इंडिया

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“हमें भारत को स्टार्टअप्स में नंबर एक बनाना हैं. बैंक नए उद्यमियों को आसान क़र्ज़ देंगे. देश की सवा लाख बैंक शाखाएं दलितों-वंचितों के लिए विशेष योजनाएं बनाएंगी. देश में सवा लाख दलित उद्यमी पैदा किए जाएंगे. उन स्टार्टअप प्रोजैक्ट को अधिक मदद दी जाएगी जिनसे अधिक रोज़गार पैदा होंगे.”
क्या है तस्वीर: मौजूदा समय में भारत में मोटे अनुमान के मुताबिक 18000 से ज्यादा स्टार्टअप्स हैं, जिसकी वैल्यू 75 अरब डॉलर बताई जा रही है. इनमें करीब तीन लाख लोग काम भी करते हैं. अगर मोदी सरकार ने अपने दावे के मुताबिक इस योजना पर अमल किया तो देश भर में स्टार्टअप्स की संख्या पांच गुनी तक बढ़ सकती है.
लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है. इंफोसिस के पूर्व निदेशक मोहनदास पई के मुताबिक केवल 10 फ़ीसदी स्टार्टअप्स ही कामयाब हो सकते हैं. फोर्ब्स की एक रिपोर्ट भी ये बताती है कि हर दस में से नौ स्टार्टअप्स नाकाम हो जाते हैं.

Friday, July 22, 2016

पेलेट गन- मारती नहीं, 'ज़िंदा लाश' बना देती है


21 जुलाई 2016

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पेलेट गनImage copyrightREUTERS

भारत प्रशासित कश्मीर में सुरक्षा बल प्रदर्शनकारियों को तितर बितर करने के लिए पेलेट गन यानी छर्रे वाली बंदूक का इस्तेमाल कर रहे हैं.
ये बंदूक जानलेवा नहीं है लेकिन इन बंदूकों के कारण कई प्रदर्शनकारियों को गंभीर चोटें लगी हैं.
कई बार प्रदर्शनकारियों के पास खड़े हुए लोग भी इनसे ज़ख्मी हुए हैं. इससे कई लोगों की आंखों की रोशनी तक चली गई है.

पेलेट गन क्या है?

ये पंप करने वाली बंदूक है जिसमें कई तरह के कारतूस इस्तेमाल होते हैं. कारतूस 5 से 12 के रेंज में होते हैं, पांच को सबसे तेज़ और ख़तरनाक माना जाता है. इसका असर काफ़ी दूर तक होता है.
पेलेट गन से तेज़ गति से छोटे लोहे के बॉल फायर किए जाते हैं और एक कारतूस में 500 तक ऐसे लोहे के बॉल हो सकते हैं.
फायर करने के बाद कारतूस हवा में फूटते हैं और छर्रे एक जगह से चारों दिशाओं में जाते हैं.

कश्मीर आंखों में छर्रेImage copyrightAARABU AHMAD SULTAN

निशाने की तरफ फायर करने के बाद छर्रे सभी दिशाओं में बिखरते हैं जिससे पास से गुज़रते या दूर खड़े किसी को भी चोटें आ सकती हैं जो प्रदर्शन या भीड़ का हिस्सा भी नहीं हैं.
पेलेट गन, आम तौर से शिकार के लिए इस्तेमाल की जाती हैं, क्योंकि इससे छर्रे चारों तरफ बिखरते हैं और शिकारी को अपने लक्ष्य पर निशाना साधने में आसानी होती है.
लेकिन कश्मीर में ये गन मनुष्यों पर इस्तेमाल हो रही है और ये खौफ़ पैदा कर रही है.
इस हथियार को 2010 में कश्मीर में अशांति के दौरान सुरक्षा बलों ने इस्तेमाल किया था जिससे 100 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई थी.

सुरक्षा बल क्या कहते हैं?

कश्मीर में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के पीआरओ राजेश्वर यादव कहते हैं कि सीआरपीएफ़ के जवान प्रदर्शनकारियों से निपटने के दौरान 'अधिकतम संयम' बरतते हैं.
राजेश्वर यादव कहते हैं, "विरोध प्रदर्शन को विफल करने के लिए हम 9 नंबर का कारतूस इस्तेमाल करते हैं. इसका कम से कम प्रभाव होता है और ये घातक नहीं है."

कश्मीर आंखों में छर्रेImage copyrightAARABU AHMAD SULTAN

लेकिन यादव की बात से सहमति नहीं रखने वाले एक उच्च पुलिस अधिकारी अपना नाम नहीं बताने की शर्त पर कहते हैं कि सुरक्षाबलों को भीड़ को तितर-बितर करने के लिए 12 नंबर के कारतूस का इस्तेमाल करना चाहिए.
बहुत की कठिन परिस्थितियों में नंबर 9 कारतूस का इस्तेमाल होना चाहिए.
भारत प्रशासित कश्मीर में हो रहे ताज़ा प्रदर्शनों के दौरान दो लोगों की मौत छर्रे लगने से हुई है.
छर्रों से कई लोगों की आंखों को गंभीर नुक़सान पहुंचने पर मानवाधिकार संगठन और कश्मीर के नागरिक समाज ने पेलेट गन के इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं.
एमनेस्टी इंटरनेश्नल (भारत) ने बयान जारी कर कश्मीर में पेलेट शॉटगन के इस्तेमाल की निंदा की है.

इलाज की दिक्कत, आंख जाने का डर

जो लोग पेलेट गन के इस्तेमाल से घायल होते हैं, उन्हें परिवारवालों को इलाज के लिए कश्मीर के बाहर ले जाना पड़ता है.
पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए उन्हें ज्यादा उम्मीदें तो नहीं हैं कि आंखों की रौशनी वापिस आ जाएगी, लेकिन इससे उन्हें भारी कीमत भी चुकानी पड़ रही है.

आमिर कबीरImage copyrightAARABU AHMAD SULTAN

उत्तरी कश्मीर के बारामुला के रहने वाले 22 साल के आमिर कबीर की ज़िंदगी पिछले पांच सालों से अंधेरे में है.
2010 की अशांति के दौरान आंखों में छर्रे लगने से उनकी दोनों आंखों की रौशनी चली गई है.
कबीर के परिवार को उसके इलाज के लिए काफी पैसों का इंतज़ाम करना पड़ा. सड़क किनारे रेड़ी लगाने वाले उनके पिता बहुत ही मुश्किल से घर चलाते हैं.
कबीर की मां कहती हैं, "मुझे अपने गहने बेचने पड़े जिससे कश्मीर के बाहर इलाज का खर्च उठाया जा सके, वो भी नाकाफी रहा और हमें अपने रिश्तेदारों और पड़ोसियों से पैसे उधार लेने पड़े."
इसी साल मार्च में 15 साल के आबिद मीर को उस वक्त छर्रे लगे जब वो एक चरमपंथी के अंतिम संस्कार से लौट रहा था.
मीर के परिवार को दूसरों से पैसे मांगकर अपने बेटे का इलाज कराना पड़ा. कश्मीर में ठीक तरीके से इलाज नहीं हो पाने के कारण उन लोगों ने अमृतसर में इलाज करने की सोची.
मीर के चाचा का कहना है, "हमें इलाज में करीब दो लाख़ रुपये खर्च करने पड़े."

'मु्र्दों की तरह जीने से मौत बेहतर'


हयात दार Image copyrightAARABU AHMAD SULTAN

जिन लोगों की छर्रे लगने से दृष्टि पूरी तरह से चली जाती है, वो मानसिक सदमे, निराशा और डिप्रेशन में डूब जाते हैं.
एक पल में उनकी ज़िन्दगी पूरी तरह से बदल जाती है .
जिनकी ज़िंदगी में एक समय उजाला रहा हो, उनके लिए अधेरे में धकेल दिया जाना स्वीकार करना बहुत मुश्किल होता है.
पुराने श्रीनगर में रहने वाले हयात डार को 2013 में रमज़ान के महीने में छर्रे लगे थे.
बहुत होनहार छात्र डार ग्रेजुएशन के अंतिम साल में था जब उसकी आंखों में छर्रे लगे.
मोटे चश्मे पहने डार कहते हैं, "मुझे पांच सर्जरी से गुज़रना पड़ा. करीब एक साल तक मैं पूरी तरह अंधेरे में रहा और अब मेरी बाईं आंख में थोड़ी रौशनी वापिस आई है."
उन्होंने कहा- "जब मेरी रौशनी चली गई तो मैं अक्सर ऊपरवाले से प्रार्थना करता था कि वो मुझे मार ही डाले. मौत बेहतर है मुर्दों की तरह ज़िंदा रहने की बजाए."

गाँधी बनाम गोडसे