Thursday, December 1, 2016

CALIPH UTHMAN BIN AFFAN (Radiallahu anhu) AND THE WELL

THIS TRUE STORY IS UNLIKE ANY OTHER.
READ, AND YOU WILL REALISE WHY.

CALIPH UTHMAN BIN AFFAN (Radiallahu anhu) AND THE WELL.

There was a well in a part of Madinah belonging to a Jew. It was the only source of water in that part, and the Jew charged Muslims exorbitant amounts for water. Uthman (Radiallahu anhu) offered to buy the well, but the Jew refused. Uthman (Radiallahu anhu) then proposed to buy half of the well, with an agreement that each would fetch on alternate days.
The Jew knew Uthman (Radiallahu anhu) as a clever businessman, and was flattered to have him as a business partner, thinking that this would increase his sales.
The exact opposite happened...no one bought water from him again.
Uthman (Radiallahu anhu) opened the well for Allah's sake, allowing people to fetch as they wanted. The people would fetch two days' supply on his day and ignore the Jew's day. Despondently, the Jew offered Uthman (Radiallahu anhu) the other half, which Uthman (Radiallahu anhu) bought for an exorbitant amount of 20,000 Dirhams.
A few years later, a Sahabi offered to buy up the well from Uthman (Radiallahu anhu). He refused, saying that he had been offered much more. The man kept increasing his offer, and Uthman (Radiallahu anhu) kept refusing on the ground that he had been offered much more. Baffled, the man asked him who had offered so much, and how much had been offered. So Uthman (Radiallahu anhu) said:
"Allah has offered ten times the reward for charity given to Muslims."

The well was kept for the free use of all Muslims, up to and after the death of Sayyadina Uthman (Radiallahu anhu), who, at that time, became the third Caliph of Islam, but wait...the story does not end there.

During the Ummayyad dynasty, the well and the surrounding ground (still nominally in the name of Sayyadina Uthman (Radiallahu anhu) since it was charitable and not inherited) were kept for free use by Muslims. Date palms grew on the grounds, and they grew numerous in time. The dates were now also harvested and given as charity in the name of Sayyadina Uthman bin Affan (Radiallahu anhu). This continued fur a few hundred years during the time of the Abbassid period and later too.
In the present history of Saudi Arabia, the decision was made to organise it into a modern plantation. The money was shared into two parts, half to be given in charity, mainly to widows and orphans, the other half to be reinvested.

This plan was and is still being carried out. Today, a bank account exists in the name of the great Sayyadina Uthman bin Affan (Radiallahu anhu), from which half of all moneys gained from the plantation are remitted, while the other half is still being given out as charity.

Out of this money, an amount was invested into purchasing land around the Masjid an-Nabawi (Sallallahu Alaihi Wa Sallam) in Madinah. This was developed into a hotel for visitors to the Mosque, and, as per arrangement, half the income was also given out as charity, while the other half is being remitted to the account to be reinvested.

As at now, disbursements from this charity, started off by this virtuous Sahabi over 1440 years ago, is upwards of Saudi Riyals 50 million monthly.

The well is known today as Bi'ir Uthman or Bi'ir Rummah. One charitable deed that has earned its giver rewards for over 14 centuries.

May Allah reward the Companions of the Noble Prophet (ﷺ), not only for their charitable deeds, but also for the help they provided in aiding our noble Prophet (Sallallahu Alaihi Wa Sallam) for us, and transmitting his message faithfully down to us for our own benefit.

May Allah grant them all Jannat al al-Firdaus and join us with them in the hereafter. 

#aameen

Moral
: HOW SINCERE ARE WE IN OUR CHARITIES?

Ad - PTC

Saturday, October 22, 2016

इस्लाम पर्दे का हुक्म क्यों देता हैं? पेश हैं एक वैज्ञानिक रिपोर्ट


बेशक इस्लाम औरत को हुक्म देता हैं कि वह पर्दे में रहे। दुनिया के सामने अपने जिस्म और खूबसूरती की नुमाइश (प्रदर्शन) न करें सिवाय उसके शौहर (पति) के। क्यों इस्लाम ने सिर्फ औरतों को ही पर्दे में रहने का हुक्म दिया? क्यों सारी पाबंदियां सिर्फ औरतों के लिए ही हैं? क्यों मर्दों के लिए इस्लाम पर्दे का हुक्म नहीं देता? क्यों इस्लाम में मर्दों पर किसी भी तरह की पाबंदी नहीं हैं? लगता हैं इस्लाम एक पुराना और रूढ़िवादी धर्म हैं।

कुछ अज्ञानी लोग बिना इस्लाम को पढ़े और समझें इस्लाम पर इस तरह के बेहूदा इल्जाम लगाने से नहीं चूकते। हालांकि इससे इस्लाम को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि इस्लाम का प्रत्येक कानून प्रत्येक कसौटी (criterion) पर खरा उतरता हैं चाहे वो सामाजिक कसौटी (Social criterion) हो, तार्किक कसौटी (logical criterion) हो या फिर वैज्ञानिक कसौटी (Scientific criterion) हो। फिर भी इन बेतुके सवालों के जवाब देने जरूरी हैं ताकि सच्चाई सबके सामने आ सकें।
इस्लाम में पर्दे का हुक्म सिर्फ औरतों के लिए ही नहीं बल्कि मर्दों के लिए भी हैं। जैसा कि कुरान ए पाक में लिखा है;

“ऐ नबी (मुहम्मद साहब स.अ.व.) कह दो मोमिन (मुसलमान) मर्दों से की अपनी नजरें नीची रखे और अपनी शर्मगाहो (शरीर के खास अंगों) की हिफाजत करें, ये उनके लिए बेहतर हैं” 
कुरान (24 :30)

कुरान की इस आयत के जरिये अल्लाह (ईश्वर) मुसलमान मर्दों को यह हुक्म दे रहा है कि वे अपनी नजरें नीची रखे और अपनी शर्मगाहो (शरीर के खास अंगों) की हिफाजत करें क्योंकि इसी में उनकी भलाई हैं। यहाँ नजरें नीची रखने का ताल्लुक (सम्बन्ध) पर्दे से ही हैं पर कुछ लोगों के मन में यह सवाल उठ सकता हैं कि नजरें नीची रखने से पर्दा कैसे हुआ? तो आइये इस सवाल का जवाब हम विज्ञान से ही पूछ लेते हैं क्योंकि हो सकता हैं कि इस्लाम के तर्क (logics) को कुछ लोग कुबुल ना करे हालांकि हकीकत तो यह हैं कि जो भी विज्ञान आज बता रहा हैं इस्लाम 1500 साल पहले ही बता चुका हैं। ये मै अपने Articles (लेखों) द्वारा साबित भी कर चुका हूँ।
अमेरिका की एक मशहूर Anthropologist (मानव विज्ञानी) जिसका नाम Helen Fisher हैं पिछले 30 सालों से Rutger University, America में Anthropology (मानव विज्ञान) की professor हैं और Human Behaviour (मानव व्यवहार) पर रिसर्च कर रही हैं और इसी विषय पर कई किताबें भी लिख चुकी हैं। उसने अपने रिसर्च से बताया कि इन्सान के शरीर में कुछ हार्मोन (hormones) होते हैं जैसे Testosterone और Estrogens और दिमाग में कुछ neurotransmitters (रसायन) होते हैं जैसे Dopamine और Serotonin और ये औरतों की तुलना में मर्दों में ज्यादा मात्रा में पाए जाते हैं जो किसी भी व्यक्ति के व्यवहार को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं।


और वह कहती हैं कि जब भी किसी मर्द की नजर किसी औरत पर पड़ती हैं तो ये हार्मोन और रसायन active (सक्रिय) हो जाते हैं और फिर मर्द उस औरत को देखकर उत्तेजित हो जाता हैं। और ऐसा तब होता हैं जब या तो औरत बहुत खूबसूरत (Charming) हो या उसका जिस्म का उभार (Figure) दिखाई देता हो। और ऐसा सिर्फ इन्सानो में ही नहीं बल्कि पक्षियों और जानवरों में भी होता हैं। आपने सुना भी होगा और देखा भी होगा कि जब कोई हाथी पागल हो जाता है तो वह तबाही मचाने लग जाता हैं। लेकिन विज्ञान कहता है कि वह हाथी पागल नहीं होता है वह तो ऐसा इसलिए करता है क्योंकि उसमें Testosterone की मात्रा बहुत बढ़ जाती हैं।

इसी तरह एक शेर दूसरे शेरों के बच्चों को मार देता है ताकि शेरनी उसकी तरफ (Mating) के लिए आकर्षित हो जाए। और सभी प्रकार के नर जानवर मादा को पाने के लिए एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं। John Hopkins University के वैज्ञानिकों ने पक्षियों के व्यवहार पर रिसर्च किया और मालूम किया कि नर पक्षी गाना गाते हैं मतलब अलग अलग तरह की आवाजें निकालते हैं ताकि वे मादा पक्षियों को आकर्षित कर सकें।
तो विज्ञान के मुताबिक औरतों (मादाओं) के जिस्म और खूबसूरती को देखकर मर्द (नर) उत्तेजित हो जाते हैं। अगर मर्दों को औरतों की तरफ आकर्षित होने से रोकना है तो औरतें अपनी खूबसूरती व जिस्म को पर्दे में रखें और मर्द भी औरतों को न घुरे तो कुरान में अल्लाह (ईश्वर) ने हमें यही तो हुक्म दिया हैं कि मुसलमान औरतें अपने आप को पर्दे में रखे और मुसलमान मर्द अपनी नजरें नीची रखे मतलब औरत को न घुरे। तो यह साबित हो गया कि इस्लाम ने सिर्फ औरतों को ही नहीं बल्कि मर्दों को भी पर्दा करने का हुक्म दिया हैं और इसी में इन्सानो की भलाई हैं।

ISLAM


भेड़ियों ने बकरियों के हक़ में एक जुलूस निकाला
कि बकरियों को आज़ादी दो,
बकरियों के हुक़ूक़ मारे जा रहे हैं,
उन्हें घरों में क़ैद कर के रखा गया है.
एक बकरी ने जब यह आवाज़ सुनी तो दूसरी बकरियों से कहा कि
सुनो सुनो हमारे हक़ में जुलूस निकाले जा रहे हैं,
चलो हम भी निकलते हैं और अपने हुक़ूक़ की आवाज़ उठाते हैं.
एक बूढ़ी बकरी बोली,
बेटी होश से काम लो,
यह भेड़िये तुम्हारे दुश्मन हैं, इनकी बातों में मत आओ.
मगर नौजवान बकरियों ने उसकी बात न मानी
और कहा कि अरे आपका ज़माना और था,
यह माडर्न ज़माना है,
अब कोई किसी के हुक़ूक़ नहीं छीन सकता.
यह भेड़िये हमारे दुश्मन कैसे हो सकते हैं,
यह तो हमारे हुक़ूक़ की बात कर रहे हैं,
हमारी आज़ादी की आवाज़ उठा रहेहैं.
यह सुनकर बूढ़ी बकरी बोली, बेटा यह तुम्हें बर्बाद करना चाहते हैं,
तुम्हारी इज़्ज़तों से खेलना चाहते हैं,
अभी तुम महफ़ूज़ हो.
अगर तुम इनकी बातों में आ गईं तो यह तुम्हें चीर फाड़ कर रख देंगे.
बूढ़ी बकरी की यह बात सुनकर जवान बकरी ग़ुस्से में आ गई और कहने लगी, अम्मा तुम तो बूढ़ीहो चुकी हो,
अब हमें हमारी ज़िंदगी जीने दो, तुम्हें क्या पता कि आज़ादी क्या होती है.
बाहर ख़ूबसूरत खेत होंगे, हरे भरे बाग़ होंगे,
हर तरफ़ हरियाली होगी, ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ होंगी. तुमअपनी नसीहत अपने पास रखो.
अब हम और यह क़ैद बर्दाश्त नहीं कर सकते.
यह कह कर सब जवान बकरियाँ आज़ादी आज़ादी के नारे लगाने लगीं
और भूख हड़ताल कर दी. बकरियों के मालिक ने जब यह सूरते हाल देखी तो मजबूरन उन्हें खोलकर आज़ाद कर दिया.
बकरियाँ बहुत ख़ुश हुईं और नारे लगाती छलाँगें मारती निकल भागीं.
मगर यह क्या ?
भेड़ियों ने तो उन पर हमला कर दिया और मासूम बकरियों को चीर फाड़ कर रख दिया.
आज औरतों की आज़ादी की बात करने वाले दर हक़ीक़त औरतों तक पहुंचने की अपनी आज़ादी चाह रहे हैं.
यह हवस के प्यासे हैं.
यह सारा खेल हुकूमतों को चलाने वाले उन सरमायेदारों का है जो अपनी तिजोरियाँ भरने के लिये औरतों को इस्तेमाल करना चाहते हैं.
अपने प्रोडक्ट्स की माडलिंग के लिये,
अपने आफ़िस और शोरूम में कस्टमर को खींचने के लिये औरतों को आगे करना चाहते हैं. अब अगर औरतें अपने घरों में रहेंगी
तो इनके मंसूबों पर पानी फिर जाएगा.
इसलिये यह सरमायेदार औरतों को घरों सेबाहर निकालने के लिये उनके हुक़ूक़ और आज़ादी की झूठी बाते करते हैं.
.जो लोग लडकी को पेट में ही मार देते है वही लोग आज केह रहे है की इस्लाम औरतो को उनके अधिकार नही देता ..
.इस्लाम वो मज़हब है जो बेटी को पेट मे मारने की इजाजत नही देता हे ....
इस्लाम में औरत के पेरो के नीचे जन्नत का दरजा है ..
.ये मज़हब है इस्लाम .....
काश कि कोई समझे !!

Friday, October 7, 2016

Surgical Strike


कांग्रेस पार्टी देश की रक्षा- सुरक्षा पर राजनिती नही करती !
यही फर्क है भाजपा और कांग्रेस में...

Wednesday, October 5, 2016


Sahabuddin



टाडा केस में संजय दत्त को सजा मिली /हर महीने पेरोल पर घर छूट्टी मनाने आते थे /पांच साल की सजा और दो साल में जेल से बाहर /नवजोत सिंह सिधु को दस साल की सजा जेल से बाहर /सूरज भान सिंह को ए पी पी राम नरेश शर्मा के हत्या मामले में उम्र क़ैद जेल से बाहर /पप्पू यादव को उम्र क़ैद सुप्रीम कोर्ट से बरी और जेल से बाहर /छोटे सरकार आनंद सिंह को हाई कोर्ट से कई मुक़दमें में मिल चुकी ज़मानत /मुन्ना शुक्ला /राजन तिवारी को कई संगीन मामले में ज़मानत /बी जे पी के अमित शाह /लाला कृष्ण आडवानी /साध्वीप्रज्ञा को कोर्ट से ज़मानत /सहित देश के सैकड़ों हिस्ट्री शीटर का हाई कोर्ट /सुप्रीम कोर्ट ने ज़मानत दिया
और जेल से छूटे किसी भी नेशनल और रिजनल इलेक्ट्रोनिक चैनल और हिंदी प्रिंट मीडिया के पेट में दर्द नहीं हुआ ,और अब जबकि मोहम्मद शहाबुद्दीन साहब ग्यारह साल तक अदालत में चली लम्बी कानूनी प्रक्रिया का सामना करने के बाद हाई कोर्ट से मिली जमानत के बाद जेल से छूटे थे और फिर सुप्रीम कोर्ट के द्वारा जमानत रद्द कर दिया गया l मैं इस देश का एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते आप सभी देशवासियों से ये सवाल करता हूँ की इस देश में कानून सभी के लिए बराबर है या कुछ अलग , आज मुझे आप सभी लोगों का इस मुद्दे पर स्पष्ट राय चाहिए l




Friday, September 9, 2016

Imagine a world without Muslims? Someone did, and its going viral!



Here's how a viral post has imagined a world without Muslims.
Racial hatred towards Muslims had hit a new high when two planes hijacked by Muslim youths radicalised by Osama Bin Laden hit the twin towers of the World Trade Centre in the United States on Sept. 11, 2001. The feeling then was that it couldn't get worse, but it did, as was witnessed by the recent terror attacks across Europe. 
And then, in the run-up to the 15th anniversary of the attacks that became known across the world as just "9/11", someone tried to fan that hatred by asking people to "imagine a world without Muslims". The post on social networking platform Tumblr has since gone viral, but for all the right reasons. 
It has gone viral because someone — more specifically, a Tumblr user named "what path" — has taken the time and shown his/her patience to collate a series of things the world would not have had without Muslims. Read their entire unedited reply here:
Yes, lets imagine a world WITHOUT MUSLIMS, shall we?
Without Muslims you wouldn't have:
  • Coffee
  • Cameras
  • Experimental Physics
  • Chess
  • Soap
  • Shampoo
  • Perfume/spirits
  • Irrigation
  • Crank-shaft, internal combustion engine, valves, pistons
  • Combination locks
  • Architectural innovation (pointed arch -European Gothic cathedrals adopted this technique as it made the building much stronger, rose windows, dome buildings, round towers, etc.)
  • Surgical instruments
  • Anesthesia
  • Windmill
  • Treatment of Cowpox
  • Fountain pen
  • Numbering system
  • Algebra/Trigonometry
  • Modern Cryptology
  • 3 course meal (soup, meat/fish, fruit/nuts)
  • Crystal glasses
  • Carpets
  • Checks
  • Gardens used for beauty and meditation instead of for herbs and kitchen.
  • University
  • Optics
  • Music
  • Toothbrush
  • Hospitals
  • Bathing
  • Quilting
  • Mariner's Compass
  • Soft drinks
  • Pendulum
  • Braille
  • Cosmetics
  • Plastic surgery
  • Calligraphy
  • Manufacturing of paper and cloth
It was a Muslim who realized that light ENTERS our eyes, unlike the Greeks who thought we EMITTED rays, and so invented a camera from this discovery.
It was a Muslim who first tried to FLY in 852, even though it is the Wright Brothers who have taken the credit.
It was a Muslim by the name of Jabir ibn Hayyan who was known as the founder of modern Chemistry. He transformed alchemy into chemistry. He invented: distillation, purification, oxidation, evaporation, and filtration. He also discovered sulfuric and nitric acid.
It is a Muslim, by the name of Al-Jazari who is known as the father of robotics.
It was a Muslim who was the architect for Henry V's castle.
It was a Muslim who invented hollow needles to suck cataracts from eyes, a technique still used today.
It was a Muslim who actually discovered inoculation, not Jenner and Pasteur to treat cowpox. The West just brought it over from Turkey
It was Muslims who contributed much to mathematics like Algebra and Trigonometry, which was imported over to Europe 300 years later to Fibonacci and the rest.
It was Muslims who discovered that the Earth was round 500 years before Galileo did.

The list goes on...........

Just imagine a world without Muslims. Now I think you probably meant, JUST IMAGINE A WORLD WITHOUT TERRORISTS. And then I would agree, the world would definitely be a better place without those pieces of filth. But to hold a whole group responsible for the actions of a few is ignorant and racist. No one would ever expect Christians or White people to be held responsible for the acts of Timothy McVeigh (Oklahoma bombing) or Anders Breivik (Norway killing), or the gun man that shot Congresswoman Giffords in head, wounded 12 and killed 6 people, and rightly so because they had nothing to do with those incidents! Just like the rest of the 1.5 billion Muslims have nothing to do with this incident!

Sources:
http://www.independent.co.uk/news/science/how-islamic-inventors-changed-the-world-469452.html
http://articles.cnn.com/2010-01-29/world/muslim.inventions_1_hassani-inventions-muslim?_s=PM:WORLD
http://www.ummahedinburgh.co.uk/radio/files/Muslim-Invention-Article.pdf

And being Indians, we would have to imagine the world without yummy food items like samosa or biryani, or the entire gamut of Mughlai cuisine. Not an option for many of us. 

Sunday, September 4, 2016

This is how Dinosaurs evolved 

This is how it happened... :) 



-(:Woman Means :)-



WOMAN

● changes her name
● changes her home
● leaves her family
● moves in with you
● builds a home with you
● gets pregnant for you
● pregnancy changes her body
● she gets fat
● almost gives up in the labour room due to the
unbearable pain of child birth
● even the kids she delivers bear your name
Till the day she dies... everything she does...
cooking, cleaning your house, taking care of your
parents, bringing up your children, earning, advising
you, ensuring you can be relaxed, maintaining all
family relations, everything that benefit you.....
sometimes at the cost of her own health, hobbies
and beauty.
So who is really doing whom a favor?
Dear men, appreciate the women in your lives
always, because it is not easy to be a woman.
*Being a woman is priceless*
Rock the world ladies!
A salute to ladies!

WOMAN MEANS :-

W ➖ WONDERFUL MOTHER
O ➖ OUTSTANDING FRIEND
M ➖ MARVELOUS DAUGHTER

A ➖ ADORABLE SISTER
N ➖ NICEST GIFT TO MEN FROM GOD


every man have to know the value of woman...


https://www.twitter.com/nnrahbar

Moral Story



एक मिनट लगेगा 
जरूर पढेँ 
अच्छा लगे
तो Share करना न भूलेँ??

एक अमीर ईन्सान था। 
उसने समुद्र मेँ अकेले
घूमने के लिए एक
नाव बनवाई।
छुट्टी के दिन वह नाव लेकर समुद्र
की सेर करने निकला।

आधे समुद्र तक पहुंचा ही था कि अचानक
एक जोरदार
तुफान आया।

उसकी नाव पुरी तरह से तहस-नहस
हो गई लेकिन वह
लाईफ जैकेट की मदद से समुद्र मेँ कूद
गया।

जब तूफान शांत हुआ तब वह
तैरता-तैरता एक टापू पर
पहुंचा 
लेकिन वहाँ भी कोई नही था।
टापू के चारो और समुद्र के अलावा कुछ
भी नजर नही आ
रहा था।

उस आदमी ने सोचा कि जब मैंने
पूरी जिदंगी मेँ
किसी का कभी भी बुरा नही किया तो मेरे
साथ ऐसा क्यूँ
हुआ..?

उस ईन्सान को लगा कि खुदा ने मौत से
बचाया तो आगे
का रास्ता भी खुदा ही बताएगा।

धीरे-धीरे वह वहाँ पर उगे झाड-फल-पत्ते
खाकर दिन बिताने
लगा।

अब धीरे-धीरे उसकी आस टूटने लगी,
खुदा पर से
उसका यकीन उठने लगा।

फिर उसने सोचा कि अब
पूरी जिंदगी यही इस टापू पर
ही बितानी है तो क्यूँ ना एक
झोपडी बना लूँ ......?

फिर उसने झाड की डालियो और पत्तो से
एक
छोटी सी झोपडी बनाई।
उसने मन ही मन कहा कि आज से झोपडी मेँ
सोने
को मिलेगा आज से बाहर
नही सोना पडेगा।

रात हुई ही थी कि अचानक मौसम बदला
बिजलियाँ जोर जोर से कड़कने लगी.!
तभी अचानक एक बिजली उस झोपडी पर
आ गिरी और
झोपडी धधकते हुए जलने लगी।

यह देखकर वह ईन्सान टूट गया।
आसमान
की तरफ देखकर
बोला
या खुदा ये तेरा कैसा इंसाफ है?
तूने मुज पर अपनी रहम की नजर क्यूँ नहीं की?

फीर वह ईन्सान हताश होकर सर पर हाथ
रखकर रो रहा था।

कि अचानक एक नाव टापू के पास आई।
नाव से उतरकर
दो आदमी बाहर आये

और बोले कि हम तुम्हे बचाने आये हैं।
दूर से इस वीरान टापू मे जलता हुआ
झोपडा देखा 
तो लगा कि कोई उस टापू
पर मुसीबत मेँ है।

अगर तुम अपनी झोपडी नही जलाते
तो हमे
पता नही चलता कि टापू पर कोई है।

उस आदमी की आँखो से आँसू गिरने लगे।
उसने खुदा से माफी माँगी और
बोला कि "या रब मुझे
क्या पता कि तूने मुझे बचाने के लिए
मेरी झोपडी जलाई
थी।यक़ीनन तू अपने बन्दों का हमेशा ख्याल रखता है। तूने मेरे सब्र का इम्तेहान लिया लेकिन मैं उसका फ़ैल हो गया। मुझे माफ़ फरमा दे।"
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moral -

दिन चाहे सुख के हों या दुख के,
खुदा अपने बन्दों के साथ हमेशा रहता हैं।

https://www.twitter.com/nnrahbar

Thursday, September 1, 2016


In The Name Of Terrorism



In The Name Of Terrorism, The Western Allies Have Been Bombing Middle East And Killing Millions Of People, Mostly For Their Greed For Oil, Money And Now To Execute Their Greatest Plan, 'Greater Israel'!!!

Tuesday, August 30, 2016

#GiveResponse : Don't pass him until you buy something from him because he is just working for live his life , not for making bank balance :'(


Saturday, August 27, 2016

दिल को झकझोर देने वाली घटना: मृत पत्नी की देह कंधे पर उठा कर बारह किलोमीटर तक चला ये आदमी क्योंकि पैसा न होने की वजह से अस्पताल ने एम्बुलेंस नहीं दी। शर्मनाक है यह।





जितनी दोषी सरकार और प्रशासन है उससे ज़रा भी कम दोषी उस पूरे 10 किमी के रास्ते में तमाशा देखने वाली जनता और तस्वीरें खींचने वाले पत्रकार नहीं हैं। आज लोग खुद इंसानियत भूल चुके हैं जब खुद पे आती है और खुद का तमाशा बनता है तो लोग रोते हैं के किसी ने उनकी मदद नहीं की जब तक इंसान एक दूसरे की मदद करने का जज़्बा दिल में पैदा नहीं करेगा तब तक इस तरह की तस्वीरें आती ही रहेंगी।

www.twitter.com/nnrahbar 

Tuesday, August 23, 2016

Happy Birthday , our great Athlete #21stAugust



Once, Usain Bolt was going through the road. A friend of his saw him and told him to get in the car and he'll drop him off. Bolt said "Sorry bruh, I'm in a hurry".



Friday, August 19, 2016

ये हैं अमरीका के ख़ुफ़िया एटमी ठिकाने

  • 16 अगस्त 2016
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Image copyrightCHRIS HINKLE

बीसवीं सदी में दुनिया ने क़रीब आधी सदी का वक़्त ज़बरदस्त डर के माहौल में बिताया. इसकी वजह थी अमरीका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध.
1945 में दूसरे विश्व युद्ध के ख़ात्मे से पहले ही अमरीका और सोवियत संघ में तनातनी बढ़ गई थी. अमरीका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम बम गिराकर दुनिया को उसकी ताक़त और उसके ख़तरों का एहसास करा दिया था.
इसके बाद से ही अमरीका और सोवियत संघ में एटमी हथियारों की होड़ मच गई थी. दोनों एक से एक एटम बम और एटमी मिसाइलें बनाने में जुट गए थे. एक वक़्त ऐसा था जब दोनों देशों के पास इतने एटमी हथियार थे कि दुनिया को कई बार मिटाया जा सकता था.
उस दौर में अमरीका और सोवियत संघ, दोनों ने कई ख़ुफ़िया एटमी ठिकाने बनाए हुए थे. जहां पर बड़ी-बड़ी न्यूक्लियर मिसाइलें छुपाकर रखी गई थीं. दोनों ही देश एक-दूसरे के इन ख़ुफ़िया एटमी ठिकानों को जानते थे. इसलिए चाहे कोई भी देश पहले हमला करता, पूरी दुनिया का तबाह होना तय था.
ये ख़ुफ़िया एटमी ठिकाने ही दुनिया की तबाही की वजह बनते. चलिए आज आपको अमरीका के ख़ुफ़िया एटमी ठिकाने की सैर पर ले चलते हैं.

Image copyrightCHRIS HINKLE

ये न्यूक्लियर बेस, अमरीका के एरिज़ोना सूबे में टक्सन नाम के शहर के क़रीब रेगिस्तानी इलाक़े में था. मेक्सिको की सीमा से ये जगह महज़ कुछ किलोमीटर दूर थी. ऊपर से देखने पर किसी को बिलकुल भी एहसास नहीं हो सकता था कि ज़मीन के नीचे दुनिया की तबाही का सामान छुपा है.
इस न्यूक्लियर बेस पर तैनात रहीं इवोन मॉरिस बताती हैं कि सोवियत संघ को तो पक्का इस जगह के बारे में पता रहा होगा. मगर उनके अपने देश में, यहां तक कि टक्सन शहर के लोगों को भी भनक नहीं रही होगी कि यहां न्यूक्लियर बेस है. इवोन, यहां 1980 से 84 तक तैनात रही थीं.
वो बताती हैं कि इस एटमी बेस में जाने के लिए तहखानों की कई सीढ़ियों से गुज़रना होता था. जिस दौरान उन्हें कई बार सुरक्षा कोड बताना होता था. इस दौरान वो लगातार कैमरे की निगरानी में रहती थीं ताकि कहीं ऐसा न हो कि बंदूक की नोक पर कोई ज़बरदस्ती एटमी बेस के भीतर घुस आए.

Image copyrightCHRIS HINKLE

इवोन कहती हैं कि ऐसे ख़ुफ़िया एटमी ठिकानों का मक़सद था दुश्मन को डराकर तीसरा विश्व युद्ध छेड़ने से रोकना. मगर, यहां पर दुनिया की तबाही का अच्छा-ख़ासा सामान जमा था. इस न्यूक्लियर बेस पर अमरीका की टाइटन 2 एटमी मिसाइलें रखी गई थीं. ये मिसाइलें क़रीब सात मंज़िल ऊंची थीं. इनमें इतनी ताक़त थी कि पलक झपकते ही सोवियत संघ का सफ़ाया हो जाता.
अगर सोवियत संघ पहले एटमी मिसाइल से अमरीका पर हमला करता तो इवोन और उनके साथियों के पास सिर्फ़ तीन मिनट होते जवाबी हमला करने के लिए. इस दौरान उन्हें सीढ़ियों से भागकर एटमी बेस के कंट्रोल रूम में जाना था. वो अकेले वहां नहीं जा सकती थीं. उनके साथ एक और साथी होता. दोनों को कई बार सिक्योरिटी चेक का सामना करना पड़ता.

Image copyrightCHRIS HINKLE

इसके बाद भी दोनों को मिसाइल लॉन्च के ऑर्डर का मिलान फ़ोन पर एक कोड डायल करके लेना होता. फिर राष्ट्रपति से मिसाइल लॉन्च का जो आदेश कोड के तौर पर आता, उसे इवोन और उनका दूसरा साथी मिलाता. कम से कम तीन बार कोड का मिलान करने के बाद ही इवोन और उनके साथी एटमी मिसाइल लॉन्च कर सकते थे और इसके लिए उनके पास सिर्फ़ तीन मिनट का वक़्त होता.
इवोन बताती हैं कि एटमी बेस की सुरक्षा कुछ ऐसी थी कि कोई एक शख़्स अकेले न तो कंट्रोल रूम में जा सकता था और न ही वो मिसाइल लॉन्च कर सकता था. ऐसा इसलिए किया गया था ताकि किसी एक शख़्स की सनक की वजह से दुनिया तबाही के रास्ते पर न चल पड़े.
1960 से 1984 तक टक्सन शहर में 18 टाइटन 2 न्यूक्लियर मिसाइलें तैनात थीं. इवोन बताती हैं कि उन्हें उस जगह तक ले जाया गया था जहां मिसाइलें रखी गई थीं. उस जगह को 'सिलो' कहते हैं. जब इवोन पहली बार इस न्यूक्लियर बेस पर पहुंची थीं तो कमांडर ने उन्हें पूरा बेस दिखाया था.

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वहां इवोन ने देखा था कि मिसाइल के निर्माता का नाम अमरीका की मशहूर कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक लिखा हुआ था. उस वक़्त जनरल इलेक्ट्रिक अपने विज्ञापन में कहती थी कि वो लोगों तक दुनिया की अच्छी चीज़ें लेकर आती है. मगर टाइटन 2 तो तबाही का सामान थी. बस यही सोचकर इवोन को हंसी आ गई थी.
अमरीका के इस ख़ुफ़िया एटमी बेस पर तैनात लोग चौबीसों घंटे की शिफ़्ट में काम करते थे. कोई भी शख़्स कभी अकेले नहीं हो सकता था. कोई न कोई हमेशा साथ में रहता था. शिफ़्ट ख़त्म होने से पहले सबको वैक्यूम क्लीनर से कालीन साफ़ करना होता था. इस वैक्यूम क्लीनर को भी कोई न तो अकेले निकाल सकता था और न ही इस्तेमाल कर सकता था. ऐसा सुरक्षा के लिहाज़ से किया गया था.
इवोन बताती हैं कि बेस में तैनात कोई एक शख़्स अकेले तीसरा विश्व युद्ध नहीं शुरू कर सकता था.
इवोन से जब पूछा गया कि क्या वो मिसाइल लांच कर देतीं? तो, उनका जवाब होता है कि आदेश मिलने पर वो पक्का ऐसा करतीं क्योंकि ये आदेश तभी मिलता जब सोवियत संघ ने अमरीका पर एटमी मिसाइल फेंक दी हो.

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ऐसे में इवोन का कहना है कि उनके परिवार का मरना तय था. वो ख़ुद भी नहीं जी पातीं क्योंकि सोवियत संघ को इस ख़ुफ़िया एटमी बेस के बारे में भी पता था तो वहां भी हमला होता ही. इसीलिए वो मरने से पहले सोवियत संघ पर मिसाइल फेंककर उसे भी तबाह ज़रूर कर जातीं क्योंकि टाइटन 2 मिसाइल को लॉन्च करने में उन्हें केवल 58 सेकेंड लगने थे.
अमरीका और सोवियत संघ दोनों को मालूम था कि एटमी हमले की सूरत में दुनिया का तबाह होना तय है. इसी वजह से तबाही का सामान कही जाने वाली इन मिसाइलों ने दुनिया को अब तक तीसरे महायुद्ध से बचाए रखा है.
हालांकि अब ये ख़ुफ़िया एटमी बेस, एक म्यूज़ियम में तब्दील कर दिया गया है. इवोन यहां की निदेशक हैं. वो लोगों को इस ख़ुफ़िया न्यूक्लियर बेस की सैर कराती हैं. वो जगह दिखाती हैं जहां मिसाइलें रखी गई थीं. पुराने कंप्यूटर और कंट्रोल रूम लोगों को दिखाती हैं.
इवोन कहती हैं कि ये म्यूज़ियम लोगों को तकनीक की ताक़त का एहसास कराता है. ये बताता है कि इससे कितनी भारी तबाही मच सकती है.
भारत और कश्मीर के बीच कौन बढ़ा रहा खाई?
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हर 15 अगस्त और 26 जनवरी को श्रीनगर में कर्फ़्यू लगा होता है. मोबाइल सेवाएं बाधित हो जाती हैं और बम धमाकों का डर होता है.
राज्य सरकार भारत के राष्ट्रीय दिवस का जश्न मनाती हैं जबकि अलगाववादी इसे काला दिवस घोषित करते हैं. जनता अपने घरों में दुबकी रहती है.
इस बार स्वाधीनता दिवस तब आया है, जब बीते छह सप्ताह से कर्फ़्यू की स्थिति है. जुलाई में एक अहम चरमपंथी के मारे जाने के बाद कश्मीर कश्मीरियों के लिए कैदख़ाना बन गया है. करीब सत्तर लाख की आबादी को अधिकांश दिन अपने घर से निकलने की इज़ाजत नहीं है और इंटरनेट की सुविधा भी प्रतिबंधित है.
भारत और कश्मीर के बीच खाई लगातार बढ़ रही है. भारत के लिए ये कहना बेहद आसान है कि ये सब पाकिस्तान करा रहा है. वहीं कश्मीरी इस बात का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं कि पाकिस्तान उनकी मदद के लिए क्या करता है.
ऐसी मुश्किल के बीच, केवल एक चीज़, हठी भारत, विद्रोह पर उतारू कश्मीर और अवसरवादी पाकिस्तान को एकजुट कर सकता है.
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लगभग मौत जैसी स्थिति को बताने वाला एक ही शब्द है, जिसे आप राष्ट्रवाद का शैतान भी कह सकते हैं.
जब कश्मीरी कर्फ़्यू को अपनी आज़ादी के संघर्ष का एक और एपिसोड बता रहे हैं, उसी वक्त भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह उत्तर प्रदेश के लखनऊ के नज़दीक काकोरी पहुंचे.
राज्य में होने वाले चुनाव को देखते हुए वे वहां भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शहीद हुए लोगों को श्रदांजलि देने पहुंचे. यह भारतीय जनता पार्टी के दो सप्ताह तक चलने वाले कार्यक्रमआज़ादी 70- याद करो कुर्बानीका हिस्सा था.
पुराने तरीकों से कश्मीर की स्थिति के साथ न्याय नहीं हो रहा है. भारत के कश्मीर से कर्फ़्यू नहीं उठाने का कारण हिंसक विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि प्रदर्शन करने वालों की आवाज़ को दबाना है. भारत नहीं चाहता कि कश्मीरी युवा आज़ादी को लेकर नारे लगाएं और दुनिया उसे सुने.
यही वजह है कि कश्मीरियों को गलियों में आज़ादी के नारे लगाने की इज़ाजत नहीं है, उन्हें घरों में बंद रहने के कहा गया है. अगर वे इसका उल्लंघन करते हुए सेंट्रल रिजर्व पुलिस फ़ोर्स के जवानों पर पत्थर फेंकते हैं तो उन्हें आंसू गैस, पैलेट गन, बुलेट और क्राउड कंट्रोल के तमाम नए तरीकों का सामना करना पड़ता है.
इस कर्फ़्यू के दौरान इंटरनेट सेवाओं को भी बाधित किया गया है, जो ये बताता है कि समस्या केवल भीड़ नियंत्रित करने की नहीं है, बल्कि आज़ादी को भी नियंत्रित करना है.
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कश्मीरियों के साथ समस्या क्या है, ये सवाल हम करते हैं. भारतीयों के साथ समस्या क्या है, ये सवाल कश्मीरियों का है. इसमें पाकिस्तान कहां से गया, ये भी हम हाथ मरोड़ते हुए पूछते हैं. दरअसल हम सबकी एक ही समस्या है वह है राष्ट्रवाद.
चूंकि मोदी सरकार अति राष्ट्रवादी है, इसलिए उसे ये ध्यान रखने की ज़्यादा ज़रूरत है जिसके बारे में स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख चिंतक रवींद्र नाथ टैगोर ने चेताया था, उन्होंने राष्ट्रवाद की बीमारियों के प्रति आगाह किया था.
विभिन्न यूरोपीय देशों में अपना अपना उपनिवेश बनाने की होड़ लगी थी. ब्रिटिश राष्ट्रवाद के नाम पर लंदन से अंग्रेज भारत पर शासन करने आए थे. टैगोर ने अपने एक व्याख्यान में कहा था, “राष्ट्रवाद एक गंभीर ख़तरा है. यह वही चीज़ है जो भारत की समस्याओं की मूल में सालों से रहा है.”
उन्होंने आगे कहा था, “हमारी वास्तविक समस्या केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि सामाजिक है. ये केवल भारत की बात नहीं है, बल्कि सभी देशों में ऐसा है.”
टैगोर के लिए राष्ट्रवाद एक तरह से व्यक्ति या फिर देश के लालच का सिद्धांत था, जो संगठित और प्राशसनिक रूप में था.
टैगोर के शब्दों में राष्ट्रवाद के चलते मनुष्य अपनी अंतरात्मा की आवाज़ से मुक्त हो जाता है जब वह अपनी ज़िम्मेदारी इस राष्ट्रवाद पर सौंप देता है, जो उसकी बुद्धिमता की उपज है लेकिन पूरी नैतिक शख्सियत की उपज नहीं है.
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उन्होंने इसे उपनिवेशिक चलन बताते हुए लिखा था, “भारत में कभी राष्ट्रवाद का वास्तविक नज़रिया रहा ही नहीं. मेरा विश्वास है कि मेरे देशवासी उस शिक्षा के ख़िलाफ़ जो ये बताती है कि देश मानवता के आदर्शों से बड़ा है, लड़कर अपना भारत हासिल कर लेंगे.”
पहले विश्वयुद्ध के दौरान उन्होंने राष्ट्रवाद के ख़तरों पर ख़ूब लिखा. उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ये भी माना था कि विभिन्न लोगों को एक साथ रखना बड़ी चुनौती होगी.
उन्होंने तबके भारतीय राष्ट्रवादियों को चेताते हुए कहा था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता हासिल करने से भारत मुक्त नहीं होगा.
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उन्होंने तब कहा था, “जब हमारे राष्ट्रवादी आदर्शों की बात करते हैं, वे राष्ट्रवाद के आधार को भूल जाते हैं. वे लोग जो आदर्शों को उठाने की बात करते हैं वे अपने सामाजिक चलन में सबसे ज़्यादा संकीर्ण हैं. मैं एक देश के ख़िलाफ़ नहीं हूं लेकिन सभी देशों को लेकर जो आम विचार है, उसके ख़िलाफ़ हूं."
टैगोर के ये शब्द आज भी प्रासंगिक हैं. वे सब लोग जो ख़ुद को राष्ट्रवादी मानते हैं- वैसे भारतीय जो कश्मीर को प्यार करते है, लेकिन कश्मीरियों को नहीं, वैसे कश्मीरी जो राष्ट्रवाद के नाम पर मरना चाहते हैं, वैसे पाकिस्तानी जिनका राष्ट्रवाद श्रीनगर में पाकिस्तानी झंडा फैलाए बिना पूरा नहीं होता- उन सबको टैगोर को पढ़ने की ज़रूरत है.

उस टैगोर को पढ़ने की जरूरत है जिन्होंने भारत और बांग्लादेश ही नहीं बल्कि श्रीलंका का भी राष्ट्रगीत लिखा था.