Tuesday, August 30, 2016

#GiveResponse : Don't pass him until you buy something from him because he is just working for live his life , not for making bank balance :'(


Saturday, August 27, 2016

दिल को झकझोर देने वाली घटना: मृत पत्नी की देह कंधे पर उठा कर बारह किलोमीटर तक चला ये आदमी क्योंकि पैसा न होने की वजह से अस्पताल ने एम्बुलेंस नहीं दी। शर्मनाक है यह।





जितनी दोषी सरकार और प्रशासन है उससे ज़रा भी कम दोषी उस पूरे 10 किमी के रास्ते में तमाशा देखने वाली जनता और तस्वीरें खींचने वाले पत्रकार नहीं हैं। आज लोग खुद इंसानियत भूल चुके हैं जब खुद पे आती है और खुद का तमाशा बनता है तो लोग रोते हैं के किसी ने उनकी मदद नहीं की जब तक इंसान एक दूसरे की मदद करने का जज़्बा दिल में पैदा नहीं करेगा तब तक इस तरह की तस्वीरें आती ही रहेंगी।

www.twitter.com/nnrahbar 

Tuesday, August 23, 2016

Happy Birthday , our great Athlete #21stAugust



Once, Usain Bolt was going through the road. A friend of his saw him and told him to get in the car and he'll drop him off. Bolt said "Sorry bruh, I'm in a hurry".



Friday, August 19, 2016

ये हैं अमरीका के ख़ुफ़िया एटमी ठिकाने

  • 16 अगस्त 2016
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Image copyrightCHRIS HINKLE

बीसवीं सदी में दुनिया ने क़रीब आधी सदी का वक़्त ज़बरदस्त डर के माहौल में बिताया. इसकी वजह थी अमरीका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध.
1945 में दूसरे विश्व युद्ध के ख़ात्मे से पहले ही अमरीका और सोवियत संघ में तनातनी बढ़ गई थी. अमरीका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम बम गिराकर दुनिया को उसकी ताक़त और उसके ख़तरों का एहसास करा दिया था.
इसके बाद से ही अमरीका और सोवियत संघ में एटमी हथियारों की होड़ मच गई थी. दोनों एक से एक एटम बम और एटमी मिसाइलें बनाने में जुट गए थे. एक वक़्त ऐसा था जब दोनों देशों के पास इतने एटमी हथियार थे कि दुनिया को कई बार मिटाया जा सकता था.
उस दौर में अमरीका और सोवियत संघ, दोनों ने कई ख़ुफ़िया एटमी ठिकाने बनाए हुए थे. जहां पर बड़ी-बड़ी न्यूक्लियर मिसाइलें छुपाकर रखी गई थीं. दोनों ही देश एक-दूसरे के इन ख़ुफ़िया एटमी ठिकानों को जानते थे. इसलिए चाहे कोई भी देश पहले हमला करता, पूरी दुनिया का तबाह होना तय था.
ये ख़ुफ़िया एटमी ठिकाने ही दुनिया की तबाही की वजह बनते. चलिए आज आपको अमरीका के ख़ुफ़िया एटमी ठिकाने की सैर पर ले चलते हैं.

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ये न्यूक्लियर बेस, अमरीका के एरिज़ोना सूबे में टक्सन नाम के शहर के क़रीब रेगिस्तानी इलाक़े में था. मेक्सिको की सीमा से ये जगह महज़ कुछ किलोमीटर दूर थी. ऊपर से देखने पर किसी को बिलकुल भी एहसास नहीं हो सकता था कि ज़मीन के नीचे दुनिया की तबाही का सामान छुपा है.
इस न्यूक्लियर बेस पर तैनात रहीं इवोन मॉरिस बताती हैं कि सोवियत संघ को तो पक्का इस जगह के बारे में पता रहा होगा. मगर उनके अपने देश में, यहां तक कि टक्सन शहर के लोगों को भी भनक नहीं रही होगी कि यहां न्यूक्लियर बेस है. इवोन, यहां 1980 से 84 तक तैनात रही थीं.
वो बताती हैं कि इस एटमी बेस में जाने के लिए तहखानों की कई सीढ़ियों से गुज़रना होता था. जिस दौरान उन्हें कई बार सुरक्षा कोड बताना होता था. इस दौरान वो लगातार कैमरे की निगरानी में रहती थीं ताकि कहीं ऐसा न हो कि बंदूक की नोक पर कोई ज़बरदस्ती एटमी बेस के भीतर घुस आए.

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इवोन कहती हैं कि ऐसे ख़ुफ़िया एटमी ठिकानों का मक़सद था दुश्मन को डराकर तीसरा विश्व युद्ध छेड़ने से रोकना. मगर, यहां पर दुनिया की तबाही का अच्छा-ख़ासा सामान जमा था. इस न्यूक्लियर बेस पर अमरीका की टाइटन 2 एटमी मिसाइलें रखी गई थीं. ये मिसाइलें क़रीब सात मंज़िल ऊंची थीं. इनमें इतनी ताक़त थी कि पलक झपकते ही सोवियत संघ का सफ़ाया हो जाता.
अगर सोवियत संघ पहले एटमी मिसाइल से अमरीका पर हमला करता तो इवोन और उनके साथियों के पास सिर्फ़ तीन मिनट होते जवाबी हमला करने के लिए. इस दौरान उन्हें सीढ़ियों से भागकर एटमी बेस के कंट्रोल रूम में जाना था. वो अकेले वहां नहीं जा सकती थीं. उनके साथ एक और साथी होता. दोनों को कई बार सिक्योरिटी चेक का सामना करना पड़ता.

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इसके बाद भी दोनों को मिसाइल लॉन्च के ऑर्डर का मिलान फ़ोन पर एक कोड डायल करके लेना होता. फिर राष्ट्रपति से मिसाइल लॉन्च का जो आदेश कोड के तौर पर आता, उसे इवोन और उनका दूसरा साथी मिलाता. कम से कम तीन बार कोड का मिलान करने के बाद ही इवोन और उनके साथी एटमी मिसाइल लॉन्च कर सकते थे और इसके लिए उनके पास सिर्फ़ तीन मिनट का वक़्त होता.
इवोन बताती हैं कि एटमी बेस की सुरक्षा कुछ ऐसी थी कि कोई एक शख़्स अकेले न तो कंट्रोल रूम में जा सकता था और न ही वो मिसाइल लॉन्च कर सकता था. ऐसा इसलिए किया गया था ताकि किसी एक शख़्स की सनक की वजह से दुनिया तबाही के रास्ते पर न चल पड़े.
1960 से 1984 तक टक्सन शहर में 18 टाइटन 2 न्यूक्लियर मिसाइलें तैनात थीं. इवोन बताती हैं कि उन्हें उस जगह तक ले जाया गया था जहां मिसाइलें रखी गई थीं. उस जगह को 'सिलो' कहते हैं. जब इवोन पहली बार इस न्यूक्लियर बेस पर पहुंची थीं तो कमांडर ने उन्हें पूरा बेस दिखाया था.

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वहां इवोन ने देखा था कि मिसाइल के निर्माता का नाम अमरीका की मशहूर कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक लिखा हुआ था. उस वक़्त जनरल इलेक्ट्रिक अपने विज्ञापन में कहती थी कि वो लोगों तक दुनिया की अच्छी चीज़ें लेकर आती है. मगर टाइटन 2 तो तबाही का सामान थी. बस यही सोचकर इवोन को हंसी आ गई थी.
अमरीका के इस ख़ुफ़िया एटमी बेस पर तैनात लोग चौबीसों घंटे की शिफ़्ट में काम करते थे. कोई भी शख़्स कभी अकेले नहीं हो सकता था. कोई न कोई हमेशा साथ में रहता था. शिफ़्ट ख़त्म होने से पहले सबको वैक्यूम क्लीनर से कालीन साफ़ करना होता था. इस वैक्यूम क्लीनर को भी कोई न तो अकेले निकाल सकता था और न ही इस्तेमाल कर सकता था. ऐसा सुरक्षा के लिहाज़ से किया गया था.
इवोन बताती हैं कि बेस में तैनात कोई एक शख़्स अकेले तीसरा विश्व युद्ध नहीं शुरू कर सकता था.
इवोन से जब पूछा गया कि क्या वो मिसाइल लांच कर देतीं? तो, उनका जवाब होता है कि आदेश मिलने पर वो पक्का ऐसा करतीं क्योंकि ये आदेश तभी मिलता जब सोवियत संघ ने अमरीका पर एटमी मिसाइल फेंक दी हो.

Image copyrightCHRIS HINKLE

ऐसे में इवोन का कहना है कि उनके परिवार का मरना तय था. वो ख़ुद भी नहीं जी पातीं क्योंकि सोवियत संघ को इस ख़ुफ़िया एटमी बेस के बारे में भी पता था तो वहां भी हमला होता ही. इसीलिए वो मरने से पहले सोवियत संघ पर मिसाइल फेंककर उसे भी तबाह ज़रूर कर जातीं क्योंकि टाइटन 2 मिसाइल को लॉन्च करने में उन्हें केवल 58 सेकेंड लगने थे.
अमरीका और सोवियत संघ दोनों को मालूम था कि एटमी हमले की सूरत में दुनिया का तबाह होना तय है. इसी वजह से तबाही का सामान कही जाने वाली इन मिसाइलों ने दुनिया को अब तक तीसरे महायुद्ध से बचाए रखा है.
हालांकि अब ये ख़ुफ़िया एटमी बेस, एक म्यूज़ियम में तब्दील कर दिया गया है. इवोन यहां की निदेशक हैं. वो लोगों को इस ख़ुफ़िया न्यूक्लियर बेस की सैर कराती हैं. वो जगह दिखाती हैं जहां मिसाइलें रखी गई थीं. पुराने कंप्यूटर और कंट्रोल रूम लोगों को दिखाती हैं.
इवोन कहती हैं कि ये म्यूज़ियम लोगों को तकनीक की ताक़त का एहसास कराता है. ये बताता है कि इससे कितनी भारी तबाही मच सकती है.
भारत और कश्मीर के बीच कौन बढ़ा रहा खाई?
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हर 15 अगस्त और 26 जनवरी को श्रीनगर में कर्फ़्यू लगा होता है. मोबाइल सेवाएं बाधित हो जाती हैं और बम धमाकों का डर होता है.
राज्य सरकार भारत के राष्ट्रीय दिवस का जश्न मनाती हैं जबकि अलगाववादी इसे काला दिवस घोषित करते हैं. जनता अपने घरों में दुबकी रहती है.
इस बार स्वाधीनता दिवस तब आया है, जब बीते छह सप्ताह से कर्फ़्यू की स्थिति है. जुलाई में एक अहम चरमपंथी के मारे जाने के बाद कश्मीर कश्मीरियों के लिए कैदख़ाना बन गया है. करीब सत्तर लाख की आबादी को अधिकांश दिन अपने घर से निकलने की इज़ाजत नहीं है और इंटरनेट की सुविधा भी प्रतिबंधित है.
भारत और कश्मीर के बीच खाई लगातार बढ़ रही है. भारत के लिए ये कहना बेहद आसान है कि ये सब पाकिस्तान करा रहा है. वहीं कश्मीरी इस बात का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं कि पाकिस्तान उनकी मदद के लिए क्या करता है.
ऐसी मुश्किल के बीच, केवल एक चीज़, हठी भारत, विद्रोह पर उतारू कश्मीर और अवसरवादी पाकिस्तान को एकजुट कर सकता है.
http://ichef.bbci.co.uk/news/ws/624/amz/worldservice/live/assets/images/2016/07/18/160718063229_kashmir_curfew_640x360_ap_nocredit.jpgAP
लगभग मौत जैसी स्थिति को बताने वाला एक ही शब्द है, जिसे आप राष्ट्रवाद का शैतान भी कह सकते हैं.
जब कश्मीरी कर्फ़्यू को अपनी आज़ादी के संघर्ष का एक और एपिसोड बता रहे हैं, उसी वक्त भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह उत्तर प्रदेश के लखनऊ के नज़दीक काकोरी पहुंचे.
राज्य में होने वाले चुनाव को देखते हुए वे वहां भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शहीद हुए लोगों को श्रदांजलि देने पहुंचे. यह भारतीय जनता पार्टी के दो सप्ताह तक चलने वाले कार्यक्रमआज़ादी 70- याद करो कुर्बानीका हिस्सा था.
पुराने तरीकों से कश्मीर की स्थिति के साथ न्याय नहीं हो रहा है. भारत के कश्मीर से कर्फ़्यू नहीं उठाने का कारण हिंसक विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि प्रदर्शन करने वालों की आवाज़ को दबाना है. भारत नहीं चाहता कि कश्मीरी युवा आज़ादी को लेकर नारे लगाएं और दुनिया उसे सुने.
यही वजह है कि कश्मीरियों को गलियों में आज़ादी के नारे लगाने की इज़ाजत नहीं है, उन्हें घरों में बंद रहने के कहा गया है. अगर वे इसका उल्लंघन करते हुए सेंट्रल रिजर्व पुलिस फ़ोर्स के जवानों पर पत्थर फेंकते हैं तो उन्हें आंसू गैस, पैलेट गन, बुलेट और क्राउड कंट्रोल के तमाम नए तरीकों का सामना करना पड़ता है.
इस कर्फ़्यू के दौरान इंटरनेट सेवाओं को भी बाधित किया गया है, जो ये बताता है कि समस्या केवल भीड़ नियंत्रित करने की नहीं है, बल्कि आज़ादी को भी नियंत्रित करना है.
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कश्मीरियों के साथ समस्या क्या है, ये सवाल हम करते हैं. भारतीयों के साथ समस्या क्या है, ये सवाल कश्मीरियों का है. इसमें पाकिस्तान कहां से गया, ये भी हम हाथ मरोड़ते हुए पूछते हैं. दरअसल हम सबकी एक ही समस्या है वह है राष्ट्रवाद.
चूंकि मोदी सरकार अति राष्ट्रवादी है, इसलिए उसे ये ध्यान रखने की ज़्यादा ज़रूरत है जिसके बारे में स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख चिंतक रवींद्र नाथ टैगोर ने चेताया था, उन्होंने राष्ट्रवाद की बीमारियों के प्रति आगाह किया था.
विभिन्न यूरोपीय देशों में अपना अपना उपनिवेश बनाने की होड़ लगी थी. ब्रिटिश राष्ट्रवाद के नाम पर लंदन से अंग्रेज भारत पर शासन करने आए थे. टैगोर ने अपने एक व्याख्यान में कहा था, “राष्ट्रवाद एक गंभीर ख़तरा है. यह वही चीज़ है जो भारत की समस्याओं की मूल में सालों से रहा है.”
उन्होंने आगे कहा था, “हमारी वास्तविक समस्या केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि सामाजिक है. ये केवल भारत की बात नहीं है, बल्कि सभी देशों में ऐसा है.”
टैगोर के लिए राष्ट्रवाद एक तरह से व्यक्ति या फिर देश के लालच का सिद्धांत था, जो संगठित और प्राशसनिक रूप में था.
टैगोर के शब्दों में राष्ट्रवाद के चलते मनुष्य अपनी अंतरात्मा की आवाज़ से मुक्त हो जाता है जब वह अपनी ज़िम्मेदारी इस राष्ट्रवाद पर सौंप देता है, जो उसकी बुद्धिमता की उपज है लेकिन पूरी नैतिक शख्सियत की उपज नहीं है.
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उन्होंने इसे उपनिवेशिक चलन बताते हुए लिखा था, “भारत में कभी राष्ट्रवाद का वास्तविक नज़रिया रहा ही नहीं. मेरा विश्वास है कि मेरे देशवासी उस शिक्षा के ख़िलाफ़ जो ये बताती है कि देश मानवता के आदर्शों से बड़ा है, लड़कर अपना भारत हासिल कर लेंगे.”
पहले विश्वयुद्ध के दौरान उन्होंने राष्ट्रवाद के ख़तरों पर ख़ूब लिखा. उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ये भी माना था कि विभिन्न लोगों को एक साथ रखना बड़ी चुनौती होगी.
उन्होंने तबके भारतीय राष्ट्रवादियों को चेताते हुए कहा था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता हासिल करने से भारत मुक्त नहीं होगा.
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उन्होंने तब कहा था, “जब हमारे राष्ट्रवादी आदर्शों की बात करते हैं, वे राष्ट्रवाद के आधार को भूल जाते हैं. वे लोग जो आदर्शों को उठाने की बात करते हैं वे अपने सामाजिक चलन में सबसे ज़्यादा संकीर्ण हैं. मैं एक देश के ख़िलाफ़ नहीं हूं लेकिन सभी देशों को लेकर जो आम विचार है, उसके ख़िलाफ़ हूं."
टैगोर के ये शब्द आज भी प्रासंगिक हैं. वे सब लोग जो ख़ुद को राष्ट्रवादी मानते हैं- वैसे भारतीय जो कश्मीर को प्यार करते है, लेकिन कश्मीरियों को नहीं, वैसे कश्मीरी जो राष्ट्रवाद के नाम पर मरना चाहते हैं, वैसे पाकिस्तानी जिनका राष्ट्रवाद श्रीनगर में पाकिस्तानी झंडा फैलाए बिना पूरा नहीं होता- उन सबको टैगोर को पढ़ने की ज़रूरत है.

उस टैगोर को पढ़ने की जरूरत है जिन्होंने भारत और बांग्लादेश ही नहीं बल्कि श्रीलंका का भी राष्ट्रगीत लिखा था.