Sunday, July 10, 2016
सहवाग पर आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप . एनआईए करेगी सहवाग की जाँच. शुरू होगा अब सहवाग का मीडिया ट्रायल. यदि ऐसा नहीं होता तो इसका अर्थ होगा कि हमारे देश का मीडिया और जाँच एजेंसियाँ दोहरे मापदंड अपनाती हैं. केवल मुसलमानो को निशाना बनाती हैं. दैनिक भाषकर की खबर है कि कशमीर इन्काउन्टर मे मारा गया हिजबुल आतंकी बुरहान सहवाग का फैन था . अब यदि बंगलादेश आत्मघाती हमले के दोषी किसी आतंत़कवादी के जाकिर नायिक के फैन होने पर जाकिर नायिक संदेहों के घेरे मे आ जाते हैं. उनका मीडिया ट्रायल और ऐनआईए द्वारा जांच करायी जा रही है तो सहवाग की जांच और मीडिया मे उनको आतंकवाद का चेहरा बनाकर पेश करने की होड़ क्यों नहीँ ?
मै डाॅ जाकिर नायक का बहुत बड़ा फैन हुं।
और उन पर लगे सारे आरोप झुठ और बेबुनियाद है क्योंकि अगर कल को कोई आतंकवादी टीवी पर आकर बोल दे मै नरेंद मोदी के विचारधारा से प्रभावित होकर आंतकी बना हुं
क्या आप यकीन कर लेंगे???
बड़ी साजिश के तहत मौका ढुंढ रही थी केन्द्र सरकार...
डाॅ जाकिर नायक के लोकप्रियता से घबराई है दुनिया...
और उन पर लगे सारे आरोप झुठ और बेबुनियाद है क्योंकि अगर कल को कोई आतंकवादी टीवी पर आकर बोल दे मै नरेंद मोदी के विचारधारा से प्रभावित होकर आंतकी बना हुं
क्या आप यकीन कर लेंगे???
बड़ी साजिश के तहत मौका ढुंढ रही थी केन्द्र सरकार...
डाॅ जाकिर नायक के लोकप्रियता से घबराई है दुनिया...
हमारा ही खून बहाया जाता है हम पर ही आतंकवादी होने का ठप्पा लगाया जाता है। हम अजमेर की दरगाह में मारे जाते हैं हम ही बम फोड़ने के आरोप में गिरफ्तार किये जाते हैं। हम ही मक्का मस्जिद में मारे जाते हैं, हम मालेगांव में भी मारे जाते हैं और हम ही गिरफ्तार भी किये जाते हैं। इराक हो या सीरिया अफगानिस्तान हो या पाकिस्तान बंग्लादेश सब जगह हमारे खून के छींटे हैं सब जगह की सड़कें हमारे ही खून से लाल हुई हैं। और हम पर ही तोहमतें हैं कि हम आतंकवादी हैं। परसों तुर्की में 44 लोग मारे गये कल बंग्लादेश में 20 लोग मार दिये गये आज इराक में 80 लोग मार दिये। किसने मारा है इनको ? क्या मुसलमानों ने ? कौन है आईसिस ? क्या मुसलमानों का संगठन है ? आईसिस को हथियार कौन देता है ? कौन उसके लड़ाको को खाना खिलाता है ? कौन उसके घायल लड़ाकों का इलाज करता है ? कहने को पूरी दुनिया आतंकवाद के खिलाफ है मगर आतंकवाद के नाम पर आतंकित भी हम ही हैं और तमाशा भी हम ही हैं। क्या यह मुसलमानों के खिलाफ अघोषित वैश्विक लड़ाई है ? जिसमें मारे भी मुसलमान जायेंगे और इल्जाम भी मुसलमानों पर होगा।
मैं किसके हाथ पे अपना लहू तलाश करूं तमाम शहर ने पहने हुऐ हैं दस्ताने।
मैं किसके हाथ पे अपना लहू तलाश करूं तमाम शहर ने पहने हुऐ हैं दस्ताने।
डॉ. ज़ाकिर नाइक जिसने हमेशा हक़ और सच बात कही और सबूत के साथ कही । अल्लाह दावत के इस शेर की दीन की मेहनत को कबूल फरमाये #आमीन
साफ कहूं तो दुनियाँ #मुसलमानों से नही बल्कि जिस तेजी से #इस्लाम पूरी दुनियाँ में फैल रहा है उससे डरती है, ये आतंक तो बदनाम करने का बहाना है ...
ईसाई से लेकर यहूदी तक हिन्दू तक सबकी बोलती बंद कराने वाला एक ही शख्स है डॉ ज़ाकिर नायक ।
अब तो हद ही गयी.... डॉ जाकिर नाइक को लेकर जिस तरह से मिडिया शब्दों का इस्तेमाल कर रही है वो अब बर्दाश्त से बाहर है, अब सभी मुस्लिम नेताओ, सभी मसलको के उलेमाओं को खुले तौर पर सामने आना चाहिए और सरकार को बताना चाहिए कि मुसलमान कमजोर नहीं हैं और न ही इस मिडिया ट्रायल से डरने वाले..!!
जाकिर नाईक को इस समय इसलिए ज्यादा हाईलाइट किया जा रहा है ताकि अपने दलालों और कुछ मुस्लिम दलालों को टीवी डिबेट में बैठाकर देश में बन रही मुस्लिम एकता और सम्मान को खंडित किया जा सके|
जैसा कि आज zee news के डिबेट में नजर आया बात आतंकवाद और उसका जाकिर नायक कनेक्शन पर थी पर पूरी डिबेट अलग अलग फिरके पर हो गई या कर दी गई|
अब सूफी वहाबी को गरिया रहे हैं
वहाबी अहले हदीस को गरिया रहे हैं
अहले हदीस सूफियों को गरिया रहे
अब सूफी वहाबी को गरिया रहे हैं
वहाबी अहले हदीस को गरिया रहे हैं
अहले हदीस सूफियों को गरिया रहे
और यही सब तो #RSS और #बीजेपी के नेता चाहते थे
कि जो एकता up चुनाव में बन रही है उसको किस तरह तोड़ा जाए पहले बांग्लादेश में हमला होता है और फिर यह सब नाटक अभी आगे-आगे देखिए होता है क्या...
कि जो एकता up चुनाव में बन रही है उसको किस तरह तोड़ा जाए पहले बांग्लादेश में हमला होता है और फिर यह सब नाटक अभी आगे-आगे देखिए होता है क्या...
“ढाका में हुए आतंकवादी हमले के बाद RSS भक्त भारतीय मीडिया ने विश्व विख्यात इस्लामी व तुलनात्मक धार्मिक अध्ययन के महान विद्वान डाक्टर ज़ाकिर नाईक को निशाने पर ले रखा है।”
कारण?
ढाका हमले के दो तथाकथित आतंकवादी फेसबुक पर डाक्टर ज़ाकिर नाईक को फॉलो करते थे। इस बीच यह भी खबर आ रही है कि NIA डाक्टर ज़ाकिर नाईक के भाषणों की पड़ताल कर रही है। NIA एक जांच एजेंसी है जिसकी ज़िम्मेदारी है कि अगर कोई व्यक्ति संदिग्ध है तो उसकी जांच करे और अगर वह व्यक्ति क़ुसूरवार पाया जाता है तो उसे क़ानून के तहत सज़ा भी दिलवाए। पर कुछ सवाल सारी दुनिया ज़रूर करेगी।
पहला सवाल:
क्या NIA या दूसरी जांच एजेन्सीज़ का यही रुख हर मामले में होता है? तो फिर असीमानंद के साथ हमारे प्रधानमंत्री की मंच साझा करते हुए फोटो है और हाफिज़ सईद के साथ वैदिक जी पाकिस्तान जाकर मिलकर आये हैं। असीमानंद और हाफिज़ सईद दोनों भारत सरकार द्वारा न सिर्फ़ घोषित आतंकवादी हैं बल्कि हाफिज़ सईद को मोदी सरकार भी मुंबई हमलों का मास्टर माइंड बताती है। NIA/ATS का वैदिक जी और मोदी जी के साथ भी क्या यही मामला है।
दूसरा सवाल:
डाक्टर ज़ाकिर नाईक ने वह बयान कब दिया जिससे प्रभावित होकर आतंकवादियों ने यह घटना अंजाम दी। इसके जवाब में जो डॉक्टर्ड विडिओज़ देशभक्त मीडिया पर प्रसारित किए जा रहे हैं वह भी अधिकतर 8 से 10 साल पुराने हैं, तो इतने दिनों तक हमारी सुरक्षा एजेंसीज़ क्या कर रही थीं।
तीसरा सवाल:
प्रज्ञा सिंह ठाकुर, कर्नल पुरोहित जैसे आतंकियों के RSS से संबंध जग ज़ाहिर हैं तो क्या किसी जांच एजेंसी ने मोहन भागवत या किसी अन्य से कभी कोई तफ्तीश की?
चौथा सवाल:
देश के पहले आतंकवादी नाथूराम गोडसे को देशभक्त बता कर एक हीरो की तरह उसकी पूजा करने वालों के साथ हमारी सुरक्षा एजेंसीज का क्या रवैया रहा है और क्या देशभक्त मीडिया ने कभी उनको भी इसी तरह निशाने पर लिया है?
पांचवां सवाल:
पूरे देश में घूम घूम कर ज़हर उगलने वाले प्रवीण तोगड़िया, योगी आदित्यनाथ, साध्वी प्राची जैसे लोगों को क्या हमारी सुरक्षा एजेंसीज़ ने नफरत फैलाने का लाइसेंस दे रखा है?
यह वह सवाल हैं जिनका जवाब भारत सरकार और भारतीय मीडिया को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देना होगा क्यों कि डाक्टर ज़ाकिर नाईक कोई गली का उचक्का नहीं जिस पर कोई भी इल्ज़ाम लगा कर जेल में डाल दिया जाए या झूटे इनकाउंटर में मार गिराया जाए।
आइए देखते हैं डाक्टर ज़ाकिर नाईक पर लगाए जाने वाले इल्ज़ाम की हक़ीक़त क्या है…………
डाक्टर ज़ाकिर नाईक आतंकवाद का समर्थन करते हैं?
सच्चाई:
डाक्टर ज़ाकिर नाईक ने कभी किसी आतंकवादी घटना का समर्थन नहीं किया बल्कि उल्टा वह आतंकवाद को इस्लाम विरोधी बताते आए हैं। इसके सुबूत में वह क़ुरआन की आयत पेश करते हैं सूरह माईदह सूरह न. 5 आयत 32 : “अगर किसी व्यक्ति ने किसी की हत्या कर दी सिवाए इसके कि वह किसी का क़ातिल हो या धरती पर फ़साद फैलाने वाला हो तो ऐसा है जैसे उसने सारे इंसानों की हत्या कर दी और अगर किसी ने किसी व्यक्ति की जान बचा ली तो ऐसा है जैसे उसने सारे इंसानों की जान बचा ली।”
2. डाक्टर ज़ाकिर नाईक ओसामा बिन लादेन का समर्थन करते हैं?
सच्चाई:
डाक्टर ज़ाकिर नाईक ने कभी ओसामा बिन लादेन का समर्थन नहीं किया बल्कि WTC टॉवर पर हमले के विषय में पूछे गए एक सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि मैं नहीं जानता की यह ओसामा बिन लादेन का काम है या किसी और का यह खबर हमें अमरीकन मीडिया से मिली है जिस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इसके विपरीत इंटरनेट पर ऐसे सुबूत मौजूद हैं जिससे आभास होता है कि यह CIA/MOSAD का काम है। आज 9/11 को 15 साल गुज़र जाने के बाद रूस ने यह दावा किया है कि उसके पास इसबात के पुख्ता सुबूत हैं कि 9/11 का हमला CIA ने करवाया था। व्लादमीर पुतिन ने इससाल 9/11 की बरसी पर Setelite Video Footage भी जारी करने का ऐलान किया है।
3. डाक्टर ज़ाकिर नाईक इस्लामी कट्टरवाद को बढ़ावा देते हैं?
सच्चाई:
यह इल्ज़ाम बिल्कुल ठीक है और इसपर डाक्टर ज़ाकिर नाईक सीना ठोक के कहते हैं की में कट्टर मुस्लिम हूँ और मुझे इसपर नाज़ है। क्यों कि इस्लाम की कोई एक भी शिक्षा ऐसी नहीं जो मानवता के खिलाफ हो। इस्लाम शांति और भाईचारे का धर्म है यह किसी को नुकसान पहुंचने के विरूद्ध है इसलिए में कट्टरता से इस्लाम पर अमल करता हूँ।
4. डाक्टर ज़ाकिर नाईक को मुसलमानों के एक छोटे से ग्रुप का समर्थन प्राप्त है अधिकतर मुस्लिम उनके विरुद्ध हैं?
सच्चाई:
डाक्टर ज़ाकिर नाईक न सिर्फ भारत बल्कि सम्पूर्ण विश्व के अधिकतर मुसलमानों के दिलों की धड़कन हैं इसका सुबूत दुनियाभर में होने वाले उनके कार्यक्रमों में लाखों लोगों का जमा होना है। दुनिया भर में किसी भी धर्म का कोई भी धर्म गुरु ऐसा नहीं जिसको सुनने के लिए आस्ट्रेलया, जापान, भारत, अरबदेश, अफ्रीका, यूरोप, अमरीका यानी सम्पूर्ण विश्व में इतनी बड़ी संख्या में लोग जमा होते हों।
फिर कुछ मुस्लिम उनका विरोध क्यों करते हैं? मामला दो और दो चार की तरह बिल्कुल साफ है, डाक्टर ज़ाकिर नाईक सभी धर्म के लोगों से अपना धार्मिक गरंथ पढ़ने को कहते हैं और पाखंडी मुल्ला/पंडित के जाल से बाहर निकलने को कहते हैं इसलिए धर्म के वह ठेकेदार जिनकी दुकानें धर्म के नाम पर ही चलती हैं डाक्टर ज़ाकिर नाईक के दुश्मन बन बैठे हैं। डाक्टर ज़ाकिर नाईक ने मुस्लिम समाज में सदियों से चले आ रहे आडम्बर, पाखण्ड और नस्लीय पुरोहित वाद को चुनौती दी है इसलिए डाक्टर ज़ाकिर नाईक के विरोध में सभी धर्म के ब्राह्मणवादी लामबद्ध हो गए हैं और दोनों धर्म के ब्राह्मणवादी अपने मीडियाई चमचों के साथ मिलकर डाक्टर ज़ाकिर नाईक को निशाने पर लिए हुए हैं |
5. डाक्टर ज़ाकिर नाईक को ब्रिटेन, कनाडा और मलेशिया में बैन किया गया है?
सच्चाई:
यह बिल्कुल झूटी अफवाह है डाक्टर ज़ाकिर नाईक बड़ी शान से इन देशों में जाते हैं। हां कुछ साल पहले RSS जैसी मानसिकता वाले कुछ लोगों ने ब्रिटेन में डाक्टर ज़ाकिर नाईक का विरोध किया था जिससे प्रभावित हो कर ब्रिटिश सरकार ने डाक्टर ज़ाकिर नाईक का मल्टीपल वीज़ा कैंसल कर दिया था जिसे डाक्टर ज़ाकिर नाईक ने ब्रिटेन की अदालत में चैलेंज किया और अदालत ने उनके हक़ में फैसला सुनाया अब डाक्टर ज़ाकिर नाईक बड़ी शान से ब्रिटेन भी जाते हैं।
वह अपनी चालें चलते हैं अल्लाह अपनी चलें चलता और अल्लाह सबसे अच्छी चाल चलने वाला है (क़ुरआन)। इंशा अल्लाह बेईमान मीडिया की इस हरकत से लोग डाक्टर ज़ाकिर नाईक को और अधिक देखेंगे और सच्चाई को समझ कर शांति के मार्ग पर आएंगे।
(संकलित MSF)
कारण?
ढाका हमले के दो तथाकथित आतंकवादी फेसबुक पर डाक्टर ज़ाकिर नाईक को फॉलो करते थे। इस बीच यह भी खबर आ रही है कि NIA डाक्टर ज़ाकिर नाईक के भाषणों की पड़ताल कर रही है। NIA एक जांच एजेंसी है जिसकी ज़िम्मेदारी है कि अगर कोई व्यक्ति संदिग्ध है तो उसकी जांच करे और अगर वह व्यक्ति क़ुसूरवार पाया जाता है तो उसे क़ानून के तहत सज़ा भी दिलवाए। पर कुछ सवाल सारी दुनिया ज़रूर करेगी।
पहला सवाल:
क्या NIA या दूसरी जांच एजेन्सीज़ का यही रुख हर मामले में होता है? तो फिर असीमानंद के साथ हमारे प्रधानमंत्री की मंच साझा करते हुए फोटो है और हाफिज़ सईद के साथ वैदिक जी पाकिस्तान जाकर मिलकर आये हैं। असीमानंद और हाफिज़ सईद दोनों भारत सरकार द्वारा न सिर्फ़ घोषित आतंकवादी हैं बल्कि हाफिज़ सईद को मोदी सरकार भी मुंबई हमलों का मास्टर माइंड बताती है। NIA/ATS का वैदिक जी और मोदी जी के साथ भी क्या यही मामला है।
दूसरा सवाल:
डाक्टर ज़ाकिर नाईक ने वह बयान कब दिया जिससे प्रभावित होकर आतंकवादियों ने यह घटना अंजाम दी। इसके जवाब में जो डॉक्टर्ड विडिओज़ देशभक्त मीडिया पर प्रसारित किए जा रहे हैं वह भी अधिकतर 8 से 10 साल पुराने हैं, तो इतने दिनों तक हमारी सुरक्षा एजेंसीज़ क्या कर रही थीं।
तीसरा सवाल:
प्रज्ञा सिंह ठाकुर, कर्नल पुरोहित जैसे आतंकियों के RSS से संबंध जग ज़ाहिर हैं तो क्या किसी जांच एजेंसी ने मोहन भागवत या किसी अन्य से कभी कोई तफ्तीश की?
चौथा सवाल:
देश के पहले आतंकवादी नाथूराम गोडसे को देशभक्त बता कर एक हीरो की तरह उसकी पूजा करने वालों के साथ हमारी सुरक्षा एजेंसीज का क्या रवैया रहा है और क्या देशभक्त मीडिया ने कभी उनको भी इसी तरह निशाने पर लिया है?
पांचवां सवाल:
पूरे देश में घूम घूम कर ज़हर उगलने वाले प्रवीण तोगड़िया, योगी आदित्यनाथ, साध्वी प्राची जैसे लोगों को क्या हमारी सुरक्षा एजेंसीज़ ने नफरत फैलाने का लाइसेंस दे रखा है?
यह वह सवाल हैं जिनका जवाब भारत सरकार और भारतीय मीडिया को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देना होगा क्यों कि डाक्टर ज़ाकिर नाईक कोई गली का उचक्का नहीं जिस पर कोई भी इल्ज़ाम लगा कर जेल में डाल दिया जाए या झूटे इनकाउंटर में मार गिराया जाए।
आइए देखते हैं डाक्टर ज़ाकिर नाईक पर लगाए जाने वाले इल्ज़ाम की हक़ीक़त क्या है…………
डाक्टर ज़ाकिर नाईक आतंकवाद का समर्थन करते हैं?
सच्चाई:
डाक्टर ज़ाकिर नाईक ने कभी किसी आतंकवादी घटना का समर्थन नहीं किया बल्कि उल्टा वह आतंकवाद को इस्लाम विरोधी बताते आए हैं। इसके सुबूत में वह क़ुरआन की आयत पेश करते हैं सूरह माईदह सूरह न. 5 आयत 32 : “अगर किसी व्यक्ति ने किसी की हत्या कर दी सिवाए इसके कि वह किसी का क़ातिल हो या धरती पर फ़साद फैलाने वाला हो तो ऐसा है जैसे उसने सारे इंसानों की हत्या कर दी और अगर किसी ने किसी व्यक्ति की जान बचा ली तो ऐसा है जैसे उसने सारे इंसानों की जान बचा ली।”
2. डाक्टर ज़ाकिर नाईक ओसामा बिन लादेन का समर्थन करते हैं?
सच्चाई:
डाक्टर ज़ाकिर नाईक ने कभी ओसामा बिन लादेन का समर्थन नहीं किया बल्कि WTC टॉवर पर हमले के विषय में पूछे गए एक सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि मैं नहीं जानता की यह ओसामा बिन लादेन का काम है या किसी और का यह खबर हमें अमरीकन मीडिया से मिली है जिस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इसके विपरीत इंटरनेट पर ऐसे सुबूत मौजूद हैं जिससे आभास होता है कि यह CIA/MOSAD का काम है। आज 9/11 को 15 साल गुज़र जाने के बाद रूस ने यह दावा किया है कि उसके पास इसबात के पुख्ता सुबूत हैं कि 9/11 का हमला CIA ने करवाया था। व्लादमीर पुतिन ने इससाल 9/11 की बरसी पर Setelite Video Footage भी जारी करने का ऐलान किया है।
3. डाक्टर ज़ाकिर नाईक इस्लामी कट्टरवाद को बढ़ावा देते हैं?
सच्चाई:
यह इल्ज़ाम बिल्कुल ठीक है और इसपर डाक्टर ज़ाकिर नाईक सीना ठोक के कहते हैं की में कट्टर मुस्लिम हूँ और मुझे इसपर नाज़ है। क्यों कि इस्लाम की कोई एक भी शिक्षा ऐसी नहीं जो मानवता के खिलाफ हो। इस्लाम शांति और भाईचारे का धर्म है यह किसी को नुकसान पहुंचने के विरूद्ध है इसलिए में कट्टरता से इस्लाम पर अमल करता हूँ।
4. डाक्टर ज़ाकिर नाईक को मुसलमानों के एक छोटे से ग्रुप का समर्थन प्राप्त है अधिकतर मुस्लिम उनके विरुद्ध हैं?
सच्चाई:
डाक्टर ज़ाकिर नाईक न सिर्फ भारत बल्कि सम्पूर्ण विश्व के अधिकतर मुसलमानों के दिलों की धड़कन हैं इसका सुबूत दुनियाभर में होने वाले उनके कार्यक्रमों में लाखों लोगों का जमा होना है। दुनिया भर में किसी भी धर्म का कोई भी धर्म गुरु ऐसा नहीं जिसको सुनने के लिए आस्ट्रेलया, जापान, भारत, अरबदेश, अफ्रीका, यूरोप, अमरीका यानी सम्पूर्ण विश्व में इतनी बड़ी संख्या में लोग जमा होते हों।
फिर कुछ मुस्लिम उनका विरोध क्यों करते हैं? मामला दो और दो चार की तरह बिल्कुल साफ है, डाक्टर ज़ाकिर नाईक सभी धर्म के लोगों से अपना धार्मिक गरंथ पढ़ने को कहते हैं और पाखंडी मुल्ला/पंडित के जाल से बाहर निकलने को कहते हैं इसलिए धर्म के वह ठेकेदार जिनकी दुकानें धर्म के नाम पर ही चलती हैं डाक्टर ज़ाकिर नाईक के दुश्मन बन बैठे हैं। डाक्टर ज़ाकिर नाईक ने मुस्लिम समाज में सदियों से चले आ रहे आडम्बर, पाखण्ड और नस्लीय पुरोहित वाद को चुनौती दी है इसलिए डाक्टर ज़ाकिर नाईक के विरोध में सभी धर्म के ब्राह्मणवादी लामबद्ध हो गए हैं और दोनों धर्म के ब्राह्मणवादी अपने मीडियाई चमचों के साथ मिलकर डाक्टर ज़ाकिर नाईक को निशाने पर लिए हुए हैं |
5. डाक्टर ज़ाकिर नाईक को ब्रिटेन, कनाडा और मलेशिया में बैन किया गया है?
सच्चाई:
यह बिल्कुल झूटी अफवाह है डाक्टर ज़ाकिर नाईक बड़ी शान से इन देशों में जाते हैं। हां कुछ साल पहले RSS जैसी मानसिकता वाले कुछ लोगों ने ब्रिटेन में डाक्टर ज़ाकिर नाईक का विरोध किया था जिससे प्रभावित हो कर ब्रिटिश सरकार ने डाक्टर ज़ाकिर नाईक का मल्टीपल वीज़ा कैंसल कर दिया था जिसे डाक्टर ज़ाकिर नाईक ने ब्रिटेन की अदालत में चैलेंज किया और अदालत ने उनके हक़ में फैसला सुनाया अब डाक्टर ज़ाकिर नाईक बड़ी शान से ब्रिटेन भी जाते हैं।
वह अपनी चालें चलते हैं अल्लाह अपनी चलें चलता और अल्लाह सबसे अच्छी चाल चलने वाला है (क़ुरआन)। इंशा अल्लाह बेईमान मीडिया की इस हरकत से लोग डाक्टर ज़ाकिर नाईक को और अधिक देखेंगे और सच्चाई को समझ कर शांति के मार्ग पर आएंगे।
(संकलित MSF)
हाँ तो इसी जमात के लोग ट्विटर को गंदगी से लबरेज़ कर रहे हैं और इसी ख़ुरपेच में आज ट्रेंड चल पडा है BanZakirNaik, ज़ाकिर नाइक इस्लाम के बहुत बड़े स्कॉलर हैं और कई धर्मों पे बहस करते हैं. उनके ख़िलाफ़ ट्रेंड चलने का कारण है कि ढाका हमले में जो आरोपी हमलावर थे उनमें से 2 ज़ाकिर नाइक को पसंद करते थे. ये बात अखबार में छपी क्या तुरंत ही ज़ाकिर नाइक के ख़िलाफ़ मुहिम शुरू हो गयी, इसमें कुछ बड़े अखबार वालों का भी दोष है जिन्होंने इस ख़बर को पूरे मसाले से छापा. अब इसमें बहुत से “जंगलर” मिज़ाज के लोगों ने ज़ाकिर को बग़ैर कभी पढ़े समझे बिना ही ना जाने क्या क्या कह डाला. कुछ एक ने तो आतंकवादी तक का लेबल लगा डाला. असल में ज़ाकिर नाइक पिछले सालों में इस्लाम के प्रचार प्रसार में बहुत कामयाब रहे हैं और इस पूरी प्रक्रिया में उन्होंने हमेशा हिंसा को बहुत बुरा क़रार देते हुए उसकी ज़बरदस्त निंदा की है. किंग फैसल अन्तराष्ट्रीय पुरूस्कार से सम्मानित ज़ाकिर नाइक का सम्मान पूरी दुनिया में होता है. उनका सम्मान करने वाले वो लोग भी शामिल हैं जो ज़ाकिर से वैचारिक मतभेद रखते हैं। उनकी दस बातो से मतभेद मैं भी रखता हूँ पर विरोध में इतना अंधा नहीं हो सकता कि उनको 0 से गुणा कर दूँ। उनका स्कूल कैम्ब्रिज यूनिवर्सटी यूनाइटेड किंगडम से एफिलियेट है और पहली ही बार में 5 छात्र जिसमे 3 बालिकाए थी, 98 फीसद लेकर आई है, मदरसो को स्कूल का रंग ज़ाकिर ने दिया है, ज़ाकिर के प्रचार से यदि कमर किसीकी टूटी है तो मज़ारों पर पाखंड बेचने वालो की, तीन तलाक और हलाला करने वालो की, औरतो को मस्जिद से दूर रखने वालो की, मदरसो को अपडेट न करने की कसम खाने वालो की, दो तीन देशों ने वैचारिक मतभेद के कारण डॉक्टर ज़ाकिर नाइक को अपने यहाँ बयान नहीं देने दिया पर ज़ाकिर ने हर जगह केस लड़ा और जीता, लेकिन तमाम ऐसे देश हैं जिन्होनें ज़ाकिर नाइक को बाक़ायदा बुलाया है, सम्मानित किया है. डॉ ज़ाकिर नाइक ने दुनिया भर में कई प्रोग्राम किये हैं और उनके वीडियो youtube जैसी वेबसाइट पे आसानी से पाए जा सकते हैं लेकिन किसी भी विडियो में उन्होंने हिंसा को बढ़ावा देने की बात नहीं कही है लेकिन ट्विटर पे जो लोग औरतों को ढेरो गाली देते रहते हैं तो उनसे हम कोई और उम्मीद तो कर नहीं सकते. ज़ाकिर नाइक के बहाने कुछ लोगों ने शाह रुख खान को भी निशाना बनाने की कोशिश की है क्यूंकि ज़ाकिर नाइक के एक प्रोग्राम में जो NDTV ने प्रसारित किया था, उसमें वो भी गए थे. अब उस प्रोग्राम में बहुत और भी लोग थे लेकिन निशाना सिर्फ़ शाह रुख खान को बनाया जाता है. इससे साबित होता है कि इन लोगों के दिमाग़ में किस क़दर नफ़रत का माहौल है.
फेसबुक पर ज़ाकिर के 1 करोड़ 40 लाख से ज़्यादा लाइक्स हैं उनमें से अगर कुछ लोग बुरा काम करने लगें तो इसका ज़िम्मेदार कोई बेवक़ूफ़ ही ज़ाकिर को बतायेगा.
चलिए वापिस इसी मुद्दे पर आ जाते हैं ढाका हमले में जो लड़के आतंकी माने जा रहे हैं उनमें से एक निबरास इस्लाम श्रद्धा कपूर का फैन था लेकिन श्रद्धा को तो कोई बैन करने की बात नहीं कर रहा अब आख़िर में श्रद्धा और ज़ाकिर क्या करें अगर उन्हें कोई ग़लत ढंग से फॉलो करे.निबरास तो फुटबाल का भी फैन था तो क्या करें पूरी फुटबॉल को बैन कर दें.
फेसबुक पर ज़ाकिर के 1 करोड़ 40 लाख से ज़्यादा लाइक्स हैं उनमें से अगर कुछ लोग बुरा काम करने लगें तो इसका ज़िम्मेदार कोई बेवक़ूफ़ ही ज़ाकिर को बतायेगा.
चलिए वापिस इसी मुद्दे पर आ जाते हैं ढाका हमले में जो लड़के आतंकी माने जा रहे हैं उनमें से एक निबरास इस्लाम श्रद्धा कपूर का फैन था लेकिन श्रद्धा को तो कोई बैन करने की बात नहीं कर रहा अब आख़िर में श्रद्धा और ज़ाकिर क्या करें अगर उन्हें कोई ग़लत ढंग से फॉलो करे.निबरास तो फुटबाल का भी फैन था तो क्या करें पूरी फुटबॉल को बैन कर दें.
मैं दहशतगर्द था मरने पे बेटा बोल सकता है
हुकूमत के इशारे पर तो मुर्दा बोल सकता है
हुकूमत की तवज्जो चाहती है ये जली बस्ती
अदालत पूछना चाहे तो मलबा बोल सकता है
कई चेहरे अभी तक मुँहज़बानी याद हैं इसको
कहीं तुम पूछ मत लेना ये गूंगा बोल सकता है
यहाँ पर नफ़रतों ने कैसे कैसे गुल खिलाये हैं
लुटी अस्मत बता देगी दुपट्टा बोल सकता है
बहुत सी कुर्सियाँ इस मुल्क में लाशों पे रखी हैं
ये वो सच है जिसे झूठे से झूठा बोल सकता है
सियासत की कसौटी पर परखिये मत वफ़ादारी
किसी दिन इंतक़ामन मेरा गुस्सा बोल सकता है
#WeSupportZakirNaik
--Asif Husain
हुकूमत के इशारे पर तो मुर्दा बोल सकता है
हुकूमत की तवज्जो चाहती है ये जली बस्ती
अदालत पूछना चाहे तो मलबा बोल सकता है
कई चेहरे अभी तक मुँहज़बानी याद हैं इसको
कहीं तुम पूछ मत लेना ये गूंगा बोल सकता है
यहाँ पर नफ़रतों ने कैसे कैसे गुल खिलाये हैं
लुटी अस्मत बता देगी दुपट्टा बोल सकता है
बहुत सी कुर्सियाँ इस मुल्क में लाशों पे रखी हैं
ये वो सच है जिसे झूठे से झूठा बोल सकता है
सियासत की कसौटी पर परखिये मत वफ़ादारी
किसी दिन इंतक़ामन मेरा गुस्सा बोल सकता है
#WeSupportZakirNaik
--Asif Husain
٭٭٭٭ایدھی!!٭٭٭٭
عبد الستار ایدھی صاحب کے انتقال کی خبر ملی تو بھائی جان کہنے لگے سمجھ نہیں آئی "انا للہ وانا الیہ رجعون" پڑھنا تھا کہ "الحمد للہ"۔ ایک لمحے کو تو انسان کا پارہ چڑھ جاۓ یہ سن کر!! لیکن چونکہ ہم ٹھہرے سدا کے "ملا"۔ ہر چیز کو اسلامی میزان میں پرکھے بغیر سکون نہیں آتا۔
ایدھی صاحب کے متعلق دو متفرق پہلوؤں سے دیکھا جاسکتا ہے۔ مذہبی پہلو اور انسانی خدمت کا پہلو جو بظاہر انتہائی شاندار ہے۔ مذہبی پہلو اتنا "خوفناک" اور "بھیانک" ہے کہ آج کل کی عجلت پسند عوام کافر سے کم پر راضی نہ ہو۔ اور واقعی مذہبی پہلو دیکھتے ہوۓ ایدھی صاحب کا اسلام بڑا "ڈانوا ڈول" سا لگتا ہے لیکن کافر ٹھہرانا مسلمان رکھنے سے ہزار درجے مشکل کام ہے۔۔ اللہ یتولی السرائر!!
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٭٭٭٭٭مذہبی پہلو٭٭٭٭٭
نومبر 2012 میں عبدالستار ایدھی نے ایک میگزین کو انٹر ویو دیتے ہوۓ کہا: "میرے نزدیک اسلام کے ارکان 6 ہیں، بلکہ حقوق العباد سب سے ذیادہ اہم ہے۔"۔ یہاں اصول کی بات ہے کہ حقوق اللہ ادا کئے بغیر حقوق العباد کا کوئی اخروی فائدہ نہیں۔ جیسے اللہ کا سب سے بڑا حق توحید ہے، لیکن جب عبداللہ بن جدعان (مکہ کا بہت بڑا سخی ) کے متعلق عائشہ رضی اللہ عنھا نے پوچھا کہ کیا اس کے انسانی خدمت کے کام اس کو کوئی فائدہ نہیں دیں گے؟؟ تو نبی صلی اللہ علیہ وسلم نے فرمایا: "کیسے عائشہ؟ جبکہ اس نے کبھی یہ تک نہیں کہا :اللھم اغفرلی! یا اللہ مجھے معاف فرما۔"
مشہور صحافی اوریا مقبول جان راوی ہیں۔ کہتے ہیں کہ کراچی میں ایک مجلس میں میں اور ایدھی صاحب اکٹھے تھے، نماز کا وقت ہوا تو میں نے کہا ایدھی صاحب نماز پڑھ لیتے ہیں۔ کہنے لگے: "آپ کا دل رکھنے کیلئے کھڑا ہوجاتا ہوں لیکن میں اسے کوئی چیز نہیں سمجھتا"۔
ایدھی صاحب کو حج کا خیال بھی آیا تھا۔ رمی جمرات کے وقت کہنے لگے: "(یہ عبث کام ہے نعوذ باللہ) پاکستان میں کم شیطان ہیں وہاں جاکر انہیں کنکریاں مار لوں گا.
ایدھی صاحب نے اپنے ایک بیان میں کہا میں 6 مہینے بعد نہایا ہوں، لوگ باہر سے صاف ہوجاتے ہیں اندر سے میلے رہتے ہیں، پانی ضائع کرتے ہیں۔
ایدھی صاحب خود کہتے ہیں: مجھے میرے بیٹے کا لندن سے فون آیا ۔ شادی کا ارادہ رکھتا تھا، میں نے کہا یہ مولویوں کے چکر میں نہ پڑجانا بس لڑکی لے جاؤ اور رکھو اسے۔ (قارئین یہ چھوٹی بات نہیں۔۔۔ النکاح من سنتی، من رغب عن سنتی فلیس منی!!! ۔ اور نکاح کے بغیر۔۔۔؟؟؟)۔ ایدھی صاحب کی زندگی کا بہت سا عرصہ بھاگی لڑکیوں، ولی اور مولوی کی "پابندیوں"، اور ولد الزنا کے "قانونی" ہونے۔۔۔۔ جیسے معاملات سے عبارت ہے۔۔ (تفصیل آگے، ان شاء اللہ۔)
محل نظر بات تو یہ ہے کہ ایدھی صاحب سواۓ حق مہر کے کسی پابندی کے قائل نہیں۔۔۔ وہ بھی صرف "انسانی ہمدردی" کی وجہ سے، میرا خیال ہے کہ یہ دین اسلام کو ایک "گالی" ہے کہ اسے انسانی ہمدردی جیسے اساسی و اصولی کام کا علمبردار نہ سمجھا جاۓ!!!
یاد رھے عبدالستار ایدھی وہی شخص ہیں جنہوں نے "گل افشانی" کی تھی کہ عید الاضحی پر قربانی سے گلیوں میں بہت گند پڑتا ہے ، یہ پیسے غریبوں کو دے دئے جائیں۔
ایدھی صاحب سے ایک انٹرویو میں استفسار کیا گیا کہ یہ مولوی حضرات کہتے ہیں آپ بے دین ہیں اللہ ایسے آدمیوں کو جنت نہیں عطا کرتے (جیسے "چھٹے ہوۓ" صحافیوں کا مکروہ انداز ہوتا ہے ۔۔۔!)۔ ایدھی صاحب کہنے لگے میں ایسی جنت میں جاؤں گا ہی نہیں جہاں ایسے (مولوی) لوگ جائیں گے!!!
۔۔۔۔۔ یا خدا خیر! ایدھی صاحب آپ تو اپنے قول و عمل (من عصانی فقد ابیٰ) سے جنت میں جانے سے انکاری ہیں کیوں؟؟ جب انسانی خدمت کے پیچھے جنت کے حصول کا جذبہ ہی نہیں تو۔۔۔۔ اللہ ہی بہتر معاملہ کرنے والا ہے۔۔۔
ایدھی صاحب کا جھاد کے متعلق یہ نظریہ ہے کہ انسانوں کی مدد کرنا ہی جھاد ہے حتیٰ کہ امریکہ، اسرائیل اور برطانیہ میں انہوں نے اس "جھاد" کیلئے ایمبولینسیں بھیجیں (بڑے غریب ممالک ہیں بے چارے)۔۔۔۔ جس کے بعد ان کا نام گینز بک آف ورلڈ ریکارڈ میں درج کر لیا گیا۔۔ دنیا میں سب سے بڑی ایمبولینس سروس کے طور پر! ہمیشہ سے "اسلحے والے جھاد" کے 180 ڈگری مخالف رہے ہیں۔
یہ تو ایدھی صاحب کی دینی سر نوشت ہے، بات تو سچ ہی ہے رسوائی کا خوف نہیں۔ لا یخافون لومۃ لائم۔۔۔ اب قبل اس سے کہ کوئی کہے یہ ملا کہیں کا ہیومن رائٹس کی بات نہیں کرتا مذہب کے پیچھے پڑگیا ہے میں اپنا قبلہ درست کئے دیتا ہوں۔ ۔ ۔
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٭٭٭٭٭فلاحی پہلو٭٭٭٭٭
یہ ان دنوں کی بات ہے جب میں سن شعور کو نہیں پہنچا تھا، جس عمر کی دھندلی یادیں ذہن میں ہوتی ہیں۔۔۔ آس پاس میں کچھ اس قسم کے الفاظ سننے کو ملتے تھے کہ ایدھی ایجنٹ ہے، ہندو ہے، قادیانی ہے، شیعہ ہے وغیرہ وغیرہ۔ خیر یہ تو اب بھی نہیں پتہ کہ ایدھی صاحب "کیا بلا" ہیں۔ اس وقت تو کچھ سروکار نہیں تھا۔۔ اب جاکر کچھ شد بد ہوئی تو معاملہ واقعی غلط محسوس ہوا (عین ممکن ہے کہ غلط نہ بھی ہو، اللہ سوء ظن سے بچاۓ)۔
اس باب میں اگر بنظر طائر دیکھا جاۓ تو خدمت خلق کا بڑا تابناک باب نظر آتا ہے۔ لیکن جہاں تک میری "مولویانہ" سمجھ شریف میں بات آئی ہے کہ یہ سب ایک بہت بڑا مفسدہ ہے۔ اور ایک عالم نے یوں ہی بے ساختہ نہیں کہ دیا کہ "ایک تخریب کار اپنے انجام کو پہنچا"۔
قارئین بات کچھ یوں ہے کہ ایدھی صاحب کی "خدمات" اور مدح میں آپ انٹرنیٹ پر بہت کچھ دیکھ سکتے ہیں۔ میں صرف چند چیزوں کی نشاندھی کرتا ہوں۔
ایدھی فاؤنڈیشن کی ابتدا کراچی میں زچگی کے مرکز سے ہوئی۔
ایدھی صاحب نے خود 38 برس میں ایک نرس بلقیس سے شادی کی۔
پاکستان زلزلوں، سیلابوں اور آفات قدرت کا شکار ہے، جبکہ اس کے برعکس جنسی و فحاشی بحران کا مسئلہ پاکستان میں کہیں کم بلکہ یورپ کے مقابلے میں نہ ہونے کے برابر ہے۔
اب خدمت خلق کا ایدھی ترجمہ "خاصا اوکھا" ہے جو اگرچہ دیگر وجھات میں سرگرم ہے لیکن مرکزی طور پر 1) بھاگ کر شادی کر لینے والی لڑکیوں کو پناہ دینا۔ 2) جو خواتین بچوں کی پرورش نہیں کرنا چاہتی ان کے بچے سنبھال کر ان کو آزاد کرنا۔ 3) حرام کاری کے نتیجے میں پیدا ہونے والے بچوں کی پرورش۔
اب یہ کچھ عجیب سی بات ہے کہ درج بالا مقاصد کے تحت صرف پاکستان میں "ہزاروں" ایمبولینسیں، مراکز اور ڈسپینسریاں۔۔۔ یعنی پاکستان نہیں ناپاکستان ہوگیا یہ۔۔ معاذاللہ
پھر بات کچھ تب سمجھ آتی ہے جب بلقیس ایدھی نے کہا کہ ہم تو پوری دنیا میں "غریبوں" کی مدد کرنا چاہتے ہیں اس لسٹ میں فلسطین، شام تو نظر نہ آۓ البتہ نیویارک، تل ابیب، لندن کا نام باقاعدہ بلقیس بیگم کے منہ سے نکلا۔۔۔ تب گمان ہوا کہ درحقیقت یہ "جنسی غریبوں" کی مدد کا کام کرنا چاہتے ہیں۔۔
ماضی قریب (2006،2007) میں بہت دیر تک یہ مسئلہ زیر بحث لایا جاتا رہا ہے کہ ایدھی فاؤنڈیشن کے تحت بچے عیسائی مشنریوں کو فروخت کئے جاتے ہیں!! اس کے ثبوت وغیرہ تو مجھے نہ مل سکے ویسے بھی کفار اعظم اور ان کا دجالی میڈیا کہاں دال میں کالا دکھنے دیتے ہیں؟ بس خیال خام یہی ہے کہ زنا کی پیداوار اولاد، اور بھاگی ہوئی لڑکیاں کہیں اور ہی جاتی ہیں کیوں کہ اب تک کوئی ایسا کیس نظر نہ آیا کہ کسی لڑکی کو اس کے گھر واپس پہنچادیا گیا ہو (گیتا کے علاوہ)!! تلخ حقیقت!!
یہ بھی جان لینا مددگار ہے کہ 2010 میں عبد الستار ایدھی صاحب کو "احمدیہ مسلم ایوارڈ" دیا گیا (یوٹیوب پر ویڈیو موجود ہے)۔ اب "احمدیہ" اور "مسلم"۔۔۔ تم ہی کہو جاناں۔ ۔ ۔ یہ ماجرا کیا ہے؟؟
مزید کہ مودی سرکار کی 10 ملین ڈالر امداد کی پیشکش وہ بھی صرف ایک گونگی بہری ہندو لڑکی کو ہندوستان بھیجنے پر۔۔۔ یا للعجب!! میں بھی کہوں اوباما اور نیتن یاہو نوبل پرائز کیوں لے بیٹھے، مودی بھی تو خدمت خلق کا ایک استعارہ ہے نا جناب!! 10 لاکھ امداد وہ بھی "پاکستانی" تنظیم کو۔۔۔ (27 اکتوبر, 2015 کی بات ہے)۔
Jone Boone مشہور مغربی صحافی اور میڈیا کونسلٹنٹ ایدھی کی تعریف اور اسلام کی توھین پر مبنی اپنے کالم "They call him infedal" میں لکھتا ہے:
۔۔۔۔۔۔"ایک دہشتگرد جو ہندوستان کو مطلوب ہے، ایف آئی ایف کے نام سے اپنی فلاحی تنظیم شروع کرچکا ہے، وہ ایدھی فاؤنڈیشن کے برعکس فلاحی کاموں کے ذریعے مسلمانوں کو ہندوستان کے خلاف کھڑا کر رہا ہے۔ ۔۔ ۔ لیکن ایدھی کا کہنا ہے کہ مجھے 60 سال ہوگئے اگر وہ دو سال میں ایدھی بننے کا خوب دیکھتا ہے تو یہ کیسے ممکن ہے؟؟ ایدھی اپنے ملک کے ملاؤں سے ناخوش ہیں جو ان سے جلتے ہیں۔ ۔ ۔ الخ"۔۔۔۔۔۔۔۔ سبحان اللہ وبحمدہ سبحان اللہ العظیم!!
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نتائج اور خلاصہ اخذ کرنا آپ پر!
ھذا ما عندی واللہ اعلم بالصواب وعلمہ اتم واکمل!
بشکریہ:عبدالعزیز ناصر۔۔۔ #اللھم_ارنا_الحق_حقا_وارزقنا_اتباعہ_وارنا_الباطل_باطلا_وارزقنا_اجتنابہ!
#خطاب
((عثمان حبیب))
عبد الستار ایدھی صاحب کے انتقال کی خبر ملی تو بھائی جان کہنے لگے سمجھ نہیں آئی "انا للہ وانا الیہ رجعون" پڑھنا تھا کہ "الحمد للہ"۔ ایک لمحے کو تو انسان کا پارہ چڑھ جاۓ یہ سن کر!! لیکن چونکہ ہم ٹھہرے سدا کے "ملا"۔ ہر چیز کو اسلامی میزان میں پرکھے بغیر سکون نہیں آتا۔
ایدھی صاحب کے متعلق دو متفرق پہلوؤں سے دیکھا جاسکتا ہے۔ مذہبی پہلو اور انسانی خدمت کا پہلو جو بظاہر انتہائی شاندار ہے۔ مذہبی پہلو اتنا "خوفناک" اور "بھیانک" ہے کہ آج کل کی عجلت پسند عوام کافر سے کم پر راضی نہ ہو۔ اور واقعی مذہبی پہلو دیکھتے ہوۓ ایدھی صاحب کا اسلام بڑا "ڈانوا ڈول" سا لگتا ہے لیکن کافر ٹھہرانا مسلمان رکھنے سے ہزار درجے مشکل کام ہے۔۔ اللہ یتولی السرائر!!
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٭٭٭٭٭مذہبی پہلو٭٭٭٭٭
نومبر 2012 میں عبدالستار ایدھی نے ایک میگزین کو انٹر ویو دیتے ہوۓ کہا: "میرے نزدیک اسلام کے ارکان 6 ہیں، بلکہ حقوق العباد سب سے ذیادہ اہم ہے۔"۔ یہاں اصول کی بات ہے کہ حقوق اللہ ادا کئے بغیر حقوق العباد کا کوئی اخروی فائدہ نہیں۔ جیسے اللہ کا سب سے بڑا حق توحید ہے، لیکن جب عبداللہ بن جدعان (مکہ کا بہت بڑا سخی ) کے متعلق عائشہ رضی اللہ عنھا نے پوچھا کہ کیا اس کے انسانی خدمت کے کام اس کو کوئی فائدہ نہیں دیں گے؟؟ تو نبی صلی اللہ علیہ وسلم نے فرمایا: "کیسے عائشہ؟ جبکہ اس نے کبھی یہ تک نہیں کہا :اللھم اغفرلی! یا اللہ مجھے معاف فرما۔"
مشہور صحافی اوریا مقبول جان راوی ہیں۔ کہتے ہیں کہ کراچی میں ایک مجلس میں میں اور ایدھی صاحب اکٹھے تھے، نماز کا وقت ہوا تو میں نے کہا ایدھی صاحب نماز پڑھ لیتے ہیں۔ کہنے لگے: "آپ کا دل رکھنے کیلئے کھڑا ہوجاتا ہوں لیکن میں اسے کوئی چیز نہیں سمجھتا"۔
ایدھی صاحب کو حج کا خیال بھی آیا تھا۔ رمی جمرات کے وقت کہنے لگے: "(یہ عبث کام ہے نعوذ باللہ) پاکستان میں کم شیطان ہیں وہاں جاکر انہیں کنکریاں مار لوں گا.
ایدھی صاحب نے اپنے ایک بیان میں کہا میں 6 مہینے بعد نہایا ہوں، لوگ باہر سے صاف ہوجاتے ہیں اندر سے میلے رہتے ہیں، پانی ضائع کرتے ہیں۔
ایدھی صاحب خود کہتے ہیں: مجھے میرے بیٹے کا لندن سے فون آیا ۔ شادی کا ارادہ رکھتا تھا، میں نے کہا یہ مولویوں کے چکر میں نہ پڑجانا بس لڑکی لے جاؤ اور رکھو اسے۔ (قارئین یہ چھوٹی بات نہیں۔۔۔ النکاح من سنتی، من رغب عن سنتی فلیس منی!!! ۔ اور نکاح کے بغیر۔۔۔؟؟؟)۔ ایدھی صاحب کی زندگی کا بہت سا عرصہ بھاگی لڑکیوں، ولی اور مولوی کی "پابندیوں"، اور ولد الزنا کے "قانونی" ہونے۔۔۔۔ جیسے معاملات سے عبارت ہے۔۔ (تفصیل آگے، ان شاء اللہ۔)
محل نظر بات تو یہ ہے کہ ایدھی صاحب سواۓ حق مہر کے کسی پابندی کے قائل نہیں۔۔۔ وہ بھی صرف "انسانی ہمدردی" کی وجہ سے، میرا خیال ہے کہ یہ دین اسلام کو ایک "گالی" ہے کہ اسے انسانی ہمدردی جیسے اساسی و اصولی کام کا علمبردار نہ سمجھا جاۓ!!!
یاد رھے عبدالستار ایدھی وہی شخص ہیں جنہوں نے "گل افشانی" کی تھی کہ عید الاضحی پر قربانی سے گلیوں میں بہت گند پڑتا ہے ، یہ پیسے غریبوں کو دے دئے جائیں۔
ایدھی صاحب سے ایک انٹرویو میں استفسار کیا گیا کہ یہ مولوی حضرات کہتے ہیں آپ بے دین ہیں اللہ ایسے آدمیوں کو جنت نہیں عطا کرتے (جیسے "چھٹے ہوۓ" صحافیوں کا مکروہ انداز ہوتا ہے ۔۔۔!)۔ ایدھی صاحب کہنے لگے میں ایسی جنت میں جاؤں گا ہی نہیں جہاں ایسے (مولوی) لوگ جائیں گے!!!
۔۔۔۔۔ یا خدا خیر! ایدھی صاحب آپ تو اپنے قول و عمل (من عصانی فقد ابیٰ) سے جنت میں جانے سے انکاری ہیں کیوں؟؟ جب انسانی خدمت کے پیچھے جنت کے حصول کا جذبہ ہی نہیں تو۔۔۔۔ اللہ ہی بہتر معاملہ کرنے والا ہے۔۔۔
ایدھی صاحب کا جھاد کے متعلق یہ نظریہ ہے کہ انسانوں کی مدد کرنا ہی جھاد ہے حتیٰ کہ امریکہ، اسرائیل اور برطانیہ میں انہوں نے اس "جھاد" کیلئے ایمبولینسیں بھیجیں (بڑے غریب ممالک ہیں بے چارے)۔۔۔۔ جس کے بعد ان کا نام گینز بک آف ورلڈ ریکارڈ میں درج کر لیا گیا۔۔ دنیا میں سب سے بڑی ایمبولینس سروس کے طور پر! ہمیشہ سے "اسلحے والے جھاد" کے 180 ڈگری مخالف رہے ہیں۔
یہ تو ایدھی صاحب کی دینی سر نوشت ہے، بات تو سچ ہی ہے رسوائی کا خوف نہیں۔ لا یخافون لومۃ لائم۔۔۔ اب قبل اس سے کہ کوئی کہے یہ ملا کہیں کا ہیومن رائٹس کی بات نہیں کرتا مذہب کے پیچھے پڑگیا ہے میں اپنا قبلہ درست کئے دیتا ہوں۔ ۔ ۔
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٭٭٭٭٭فلاحی پہلو٭٭٭٭٭
یہ ان دنوں کی بات ہے جب میں سن شعور کو نہیں پہنچا تھا، جس عمر کی دھندلی یادیں ذہن میں ہوتی ہیں۔۔۔ آس پاس میں کچھ اس قسم کے الفاظ سننے کو ملتے تھے کہ ایدھی ایجنٹ ہے، ہندو ہے، قادیانی ہے، شیعہ ہے وغیرہ وغیرہ۔ خیر یہ تو اب بھی نہیں پتہ کہ ایدھی صاحب "کیا بلا" ہیں۔ اس وقت تو کچھ سروکار نہیں تھا۔۔ اب جاکر کچھ شد بد ہوئی تو معاملہ واقعی غلط محسوس ہوا (عین ممکن ہے کہ غلط نہ بھی ہو، اللہ سوء ظن سے بچاۓ)۔
اس باب میں اگر بنظر طائر دیکھا جاۓ تو خدمت خلق کا بڑا تابناک باب نظر آتا ہے۔ لیکن جہاں تک میری "مولویانہ" سمجھ شریف میں بات آئی ہے کہ یہ سب ایک بہت بڑا مفسدہ ہے۔ اور ایک عالم نے یوں ہی بے ساختہ نہیں کہ دیا کہ "ایک تخریب کار اپنے انجام کو پہنچا"۔
قارئین بات کچھ یوں ہے کہ ایدھی صاحب کی "خدمات" اور مدح میں آپ انٹرنیٹ پر بہت کچھ دیکھ سکتے ہیں۔ میں صرف چند چیزوں کی نشاندھی کرتا ہوں۔
ایدھی فاؤنڈیشن کی ابتدا کراچی میں زچگی کے مرکز سے ہوئی۔
ایدھی صاحب نے خود 38 برس میں ایک نرس بلقیس سے شادی کی۔
پاکستان زلزلوں، سیلابوں اور آفات قدرت کا شکار ہے، جبکہ اس کے برعکس جنسی و فحاشی بحران کا مسئلہ پاکستان میں کہیں کم بلکہ یورپ کے مقابلے میں نہ ہونے کے برابر ہے۔
اب خدمت خلق کا ایدھی ترجمہ "خاصا اوکھا" ہے جو اگرچہ دیگر وجھات میں سرگرم ہے لیکن مرکزی طور پر 1) بھاگ کر شادی کر لینے والی لڑکیوں کو پناہ دینا۔ 2) جو خواتین بچوں کی پرورش نہیں کرنا چاہتی ان کے بچے سنبھال کر ان کو آزاد کرنا۔ 3) حرام کاری کے نتیجے میں پیدا ہونے والے بچوں کی پرورش۔
اب یہ کچھ عجیب سی بات ہے کہ درج بالا مقاصد کے تحت صرف پاکستان میں "ہزاروں" ایمبولینسیں، مراکز اور ڈسپینسریاں۔۔۔ یعنی پاکستان نہیں ناپاکستان ہوگیا یہ۔۔ معاذاللہ
پھر بات کچھ تب سمجھ آتی ہے جب بلقیس ایدھی نے کہا کہ ہم تو پوری دنیا میں "غریبوں" کی مدد کرنا چاہتے ہیں اس لسٹ میں فلسطین، شام تو نظر نہ آۓ البتہ نیویارک، تل ابیب، لندن کا نام باقاعدہ بلقیس بیگم کے منہ سے نکلا۔۔۔ تب گمان ہوا کہ درحقیقت یہ "جنسی غریبوں" کی مدد کا کام کرنا چاہتے ہیں۔۔
ماضی قریب (2006،2007) میں بہت دیر تک یہ مسئلہ زیر بحث لایا جاتا رہا ہے کہ ایدھی فاؤنڈیشن کے تحت بچے عیسائی مشنریوں کو فروخت کئے جاتے ہیں!! اس کے ثبوت وغیرہ تو مجھے نہ مل سکے ویسے بھی کفار اعظم اور ان کا دجالی میڈیا کہاں دال میں کالا دکھنے دیتے ہیں؟ بس خیال خام یہی ہے کہ زنا کی پیداوار اولاد، اور بھاگی ہوئی لڑکیاں کہیں اور ہی جاتی ہیں کیوں کہ اب تک کوئی ایسا کیس نظر نہ آیا کہ کسی لڑکی کو اس کے گھر واپس پہنچادیا گیا ہو (گیتا کے علاوہ)!! تلخ حقیقت!!
یہ بھی جان لینا مددگار ہے کہ 2010 میں عبد الستار ایدھی صاحب کو "احمدیہ مسلم ایوارڈ" دیا گیا (یوٹیوب پر ویڈیو موجود ہے)۔ اب "احمدیہ" اور "مسلم"۔۔۔ تم ہی کہو جاناں۔ ۔ ۔ یہ ماجرا کیا ہے؟؟
مزید کہ مودی سرکار کی 10 ملین ڈالر امداد کی پیشکش وہ بھی صرف ایک گونگی بہری ہندو لڑکی کو ہندوستان بھیجنے پر۔۔۔ یا للعجب!! میں بھی کہوں اوباما اور نیتن یاہو نوبل پرائز کیوں لے بیٹھے، مودی بھی تو خدمت خلق کا ایک استعارہ ہے نا جناب!! 10 لاکھ امداد وہ بھی "پاکستانی" تنظیم کو۔۔۔ (27 اکتوبر, 2015 کی بات ہے)۔
Jone Boone مشہور مغربی صحافی اور میڈیا کونسلٹنٹ ایدھی کی تعریف اور اسلام کی توھین پر مبنی اپنے کالم "They call him infedal" میں لکھتا ہے:
۔۔۔۔۔۔"ایک دہشتگرد جو ہندوستان کو مطلوب ہے، ایف آئی ایف کے نام سے اپنی فلاحی تنظیم شروع کرچکا ہے، وہ ایدھی فاؤنڈیشن کے برعکس فلاحی کاموں کے ذریعے مسلمانوں کو ہندوستان کے خلاف کھڑا کر رہا ہے۔ ۔۔ ۔ لیکن ایدھی کا کہنا ہے کہ مجھے 60 سال ہوگئے اگر وہ دو سال میں ایدھی بننے کا خوب دیکھتا ہے تو یہ کیسے ممکن ہے؟؟ ایدھی اپنے ملک کے ملاؤں سے ناخوش ہیں جو ان سے جلتے ہیں۔ ۔ ۔ الخ"۔۔۔۔۔۔۔۔ سبحان اللہ وبحمدہ سبحان اللہ العظیم!!
۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔
نتائج اور خلاصہ اخذ کرنا آپ پر!
ھذا ما عندی واللہ اعلم بالصواب وعلمہ اتم واکمل!
بشکریہ:عبدالعزیز ناصر۔۔۔ #اللھم_ارنا_الحق_حقا_وارزقنا_اتباعہ_وارنا_الباطل_باطلا_وارزقنا_اجتنابہ!
#خطاب
((عثمان حبیب))
ایک درد مندانہ گزارش
ڈاکٹر ذاکر نائیک کسی مسلک کا نہیں اسلام کا ترجمان ہے اور بحیثیت مسلمان ہماری ذمہ داری ہے کہ سب ملکر اس کڑے وقت میں ان کا ساتھ دیں . . . . .
ہاں جزوی طور پر ڈاکٹر صاحب کی ہر بات سے متفق ہونا ضروری نہیں اختلاف رائے آپ کا حق ہے
لیکن خدا راہ مسلکی تعصب کی بنیاد پر دشمنان اسلام کا ساتھ مت دیں یاد رکھیں ہم پہلے مسلمان ہیں اور دیوبندی ،بریلوی ، اور اہلحدیث بعد میں ہیں .
یہ بات بالکل بجا ھے اور ضروری ھے لیکن جذبات میں قدم اٹھا نا مناسب نہیں اکابرین سے رجوع ھوکر انکے مشورہ پر عمل کیا جاۓ بہتر رھیگا...ورنہ ...
ھم تو ڈوبے ھے صنم تمکو بھی لے ڈوبینگے ؛
کہ مصداق ھوجاۓ گا پھر بعد میں سونچنا بیکار ھوگا
ڈاکٹر ذاکر نائیک کسی مسلک کا نہیں اسلام کا ترجمان ہے اور بحیثیت مسلمان ہماری ذمہ داری ہے کہ سب ملکر اس کڑے وقت میں ان کا ساتھ دیں . . . . .
ہاں جزوی طور پر ڈاکٹر صاحب کی ہر بات سے متفق ہونا ضروری نہیں اختلاف رائے آپ کا حق ہے
لیکن خدا راہ مسلکی تعصب کی بنیاد پر دشمنان اسلام کا ساتھ مت دیں یاد رکھیں ہم پہلے مسلمان ہیں اور دیوبندی ،بریلوی ، اور اہلحدیث بعد میں ہیں .
یہ بات بالکل بجا ھے اور ضروری ھے لیکن جذبات میں قدم اٹھا نا مناسب نہیں اکابرین سے رجوع ھوکر انکے مشورہ پر عمل کیا جاۓ بہتر رھیگا...ورنہ ...
ھم تو ڈوبے ھے صنم تمکو بھی لے ڈوبینگے ؛
کہ مصداق ھوجاۓ گا پھر بعد میں سونچنا بیکار ھوگا
وقت نکال کر اس مضمون کو ضرور پڑھیں... دوستو بغیر پڑھے اس کو ڈیلٹ نہ کریں
برطانیہ میں جعلی علماء کس طرح تیار کیے جاتے ہیں ؟
۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰۰
مسلمانوں کو بہت سے مسائل کے ساتھ جس ایک بڑے چیلنج کا سامنا ہے، وہ ہے باہمی اتحاد کی کمی،ایک خدا،ایک رسولؐ ،ایک کتاب،ایک امت ،لیکن پھر بھی امت اتنی پارہ پارہ کیوں ہے ۔ اس میں ہماری اپنی کوتاہیوں کے ساتھ اسلام کے دشمنوں کی بھی محنت شامل ہے۔ زیرِ نظر تحریر ایک ایسی ہی حقیقت ہے کہ کیوں ابھی تک ہم ایک چاند پر بھی متفق نہیں ہو پارہے ہیں؟۔یہ مضمون جولائی 2010 ءکے’اُردو ڈائجسٹ ‘میں شائع ہوا تھا۔
”نواب راحت خان سعید خان چھتاری 1940 ءکی دہائی میں ہندوستان کے صوبے اتر پردیش کے گورنر رہے ۔ انگریز حکومت نے انہیں یہ اہم عہدہ اس لئے عطا کیا کہ وہ مسلم لیگ اور کانگریس کی سیاست سے لاتعلق رہ کر انگریزوں کی وفاداری کا دم بھرتے تھے۔نواب چھتاری اپنی یادداشتیں لکھتے ہوئے انکشاف کرتے ہیں کہ ایک بار انہیں سرکاری ڈیوٹی پر لندن بلایا گیا ۔ان کے ایک پکے انگریز دوست نے، جو ہندوستان میں کلکٹر رہ چکاتھا ،نواب صاحب سے کہا: ”آئیے ! آپ کو ایک ایسی جگہ کی سیر کرائوں، جہاں میرے خیال میں آج تک کوئی ہندوستانی نہیں گیا۔“نواب صاحب خوش ہوگئے ۔انگریز کلکٹر نے پھر نواب صاحب سے پاسپورٹ مانگا کہ وہ جگہ دیکھنے کیلئے حکومت سے تحریری اجازت لینی ضروری تھی۔دو روز بعدکلکٹر اجازت نامہ ساتھ لے آیا اور کہا: ”ہم کل صبح چلیں گے“ لیکن میری موٹر میں‘موٹر وہاں لے جانے کی اجازت نہیں۔
اگلی صبح نواب صاحب اور وہ انگریز منزل کی طرف روانہ ہوئے ۔شہر سے باہر نکل کر بائیں طرف جنگل شروع ہوگیا ۔جنگل میں ایک پتلی سی سڑک موجودتھی۔جوں جوں چلتے گئے جنگل گھنا ہوتا گیا ۔سڑک کے دونوں جانب نہ کوئی ٹریفک تھا، نہ کوئی پیدل مسافر۔ نواب صاحب حیران بیٹھے اِدھراُدھر دیکھ رہے تھے۔ موٹرچلے چلتے آدھے گھنٹے سے زیادہ وقت گزر گیا۔تھوڑی دیربعد ایک بہت بڑا دروازہ نظر آیا ۔پھر دور سامنے ایک نہایت وسیع وعریض عمارت دکھائی دی،اس کے چاروں طرف کانٹے دار جھاڑیاں اور درختوں کی ایسی دیوار تھی، جسے عبور کرنا ناممکن تھا،عمارت کے چاروں طرف زبردست فوجی پہرہ تھا۔
اس عمارت کے باہر فوجیوں نے پاسپورٹ اور تحریری اجازت نامہ غور سے دیکھا اور حکم دیا کہ اپنی موٹر وہیں چھوڑ دیں اور آگے جو فوجی موٹر کھڑی ہے، اس میں سوار ہو جائیں،نواب صاحب اور انگریز کلکٹر پہرے داروں کی موٹر میں بیٹھ گئے۔ اب پھر اس پتلی سڑک پر سفر شروع ہوا،وہی گھنا جنگل اور دونوں طرف جنگلی درختوں کی دیواریں۔نواب صاحب گھبرانے لگے تو انگریز نے کہا :”بس منزل آنے والی ہے۔“آخر دورایک اور سرخ پتھر کی بڑی عمارت نظر آئی تو فوجی ڈرائیور نے موٹر روک دی اور کہا: ”یہاں سے آگے آپ صرف پیدل جا سکتے ہیں “۔راستے میں کلکٹر نے نواب صاحب سے کہا :”یاد رکھیں ‘کہ آپ یہاں صرف دیکھنے آئے ہیں، بولنے یا سوال کرنے کی بالکل اجازت نہیں ۔“
عمارت کے شروع میں دالان تھا ،اس کے پیچھے متعدد کمرے تھے ۔دالان میں داخل ہوئے تو ایک باریش نوجوان عربی کپڑے پہنے سر پر عربی رومال لپیٹے ایک کمرے سے نکلا۔ دوسرے کمرے سے ایسے ہی دو نوجوان نکلے ۔ پہلے نے عربی لہجے میں ”السلام علیکم“ کہا۔دوسرے نے ”وعلیکم السلام !کیا حال ہے ؟“نواب صاحب یہ منظر دیکھ کر حیران رہ گئے۔کچھ پوچھنا چاہتے تھے لیکن انگریز نے فوراً اشارے سے منع کردیا۔چلتے چلتے ایک کمرے کے دروازے پر پہنچے ،دیکھا کہ اندر مسجد جیسا فرش بچھاہے ،عربی لباس میں ملبوس متعدد طلبہ فرش پر بیٹھے ہیں، ان کے سامنے استاد بالکل اسی طرح بیٹھے سبق پڑھا رہے ہیں، جیسے اسلامی مدرسوں میں پڑھاتے ہیں۔طلباءعربی اور کبھی انگریزی میں استاد سے سوال بھی کرتے ۔نواب صاحب نے دیکھا کہ کسی کمرے میں قرآن کا درس ہورہا ہے ،کسی جگہ بخاری کا درس دیا جارہا ہے اور کہیں مسلم شریف کا ۔ایک کمرے میں مسلمانوں اور مسیحوں کے درمیان مناظرہ ہورہا تھا۔ ایک اور کمرے میں فقہی مسائل پر بات ہورہی تھی ۔سب سے بڑے کمرے میں قرآن مجید کا ترجمہ مختلف زبانوں میں سکھایا جارہا تھا۔
انہوں نے نوٹ کیا کہ ہر جگہ باریک مسئلے مسائل پر زور ہے ۔مثلاً وضو،روزے،نماز اور سجدہ سہو کے مسائل ، وراثت اور رضاعت کے جھگڑے ،لباس اور داڑھی کی وضع قطع،چاند کانظر آنا،غسل خانے کے آداب ،حج کے مناسک،بکرا ،دنبہ کیساہو،چھری کیسی ہو ،دنبہ حلال ہے یا حرام،حج بدل اور قضاءنمازوں کی بحث،عید کا دن کیسے طے کیاجائے اورحج کا کیسے؟پتلون پہنناجائزہے یا ناجائز ؟عورت کی پاکی کے جھگڑے ،امام کے پیچھے سورة الفاتحہ پڑھی جائے یا نہیں ؟تراویح آٹھ ہیں یا بیس؟وغیرہ ۔ایک استاد نے سوال کیا،پہلے عربی پھر انگریزی اور آخر میں نہایت شستہ اردو میں!”جماعت اب یہ بتائے کہ جادو ،نظربد،تعویذ ،گنڈہ آسیب کا سایہ برحق ہے یا نہیں ؟“پینتیس چالیس کی جماعت بہ یک آواز پہلے انگریزی میں بولیTRUE,TRUE پھر عربی میں یہی جواب دیا اور اردو میں!
ایک طالب علم نے کھڑے ہو کر سوال کیا: ”الاستاد ،قرآن تو کہتا ہے ہر شخص اپنے اعمال کا ذمہ دار خود ہے۔“استاد بولے: ”قرآن کی بات مت کرو،روایات اور ورد میں مسلمان کا ایمان پکا کرو۔ستاروں ،ہاتھ کی لکیروں ،مقدراور نصیب میں انہیں اُلجھاو۔“
یہ سب دیکھ کر وہ واپس ہوئے تو نواب چھتاری نے انگریز کلکٹر سے پوچھا: ”اتنے عظیم دینی مدرسے کو آپ نے کیوں چھپارکھا ہے؟“انگریز نے کہا: ”ارے بھئی ،ان سب میں کوئی مسلمان نہیں، یہ سب عیسائی ہیں،تعلیم مکمل ہونے پرانہیں مسلمان ملکوںخصوصاًمشرق وسطیٰ،ترکی،ایران اور ہندوستان بھیج دیا جاتا ہے۔وہاں پہنچ کر یہ کسی بڑی مسجد میں نماز پڑھتے ہیں ۔پھر نمازیوں سے کہتے ہیں کہ وہ یورپی مسلمان ہیں ۔انہوں نے مصر کی جامعہ الازہر میں تعلیم پائی ہے اور وہ مکمل عالم ہیں ۔یورپ میں اتنے اسلامی ادارے موجود نہیں کہ وہ تعلیم دے سکیں،وہ سردست تنخواہ نہیں چاہتے ،صرف کھانا،سر چھپانے کی جگہ درکار ہے۔وہ مؤذن،پیش امام ،بچوں کیلئے قرآن پڑھانے کے طورپراپنی خدمات پیش کرتے ہیں ،تعلیمی ادارہ ہو تو اس میں استاد مقررہوجاتے ہیں۔جمعہ کے خطبے تک دیتے ہیں۔“
نواب صاحب کے انگریز مہمان نے انہیں یہ بتا کر حیران کردیا کہ اِس’ عظیم مدرسے‘ کے بنیادی اہداف یہ ہیں:
(۱) مسلمانوں کو وظیفوں اور نظری مسائل میں الجھاکر قرآن سے دور رکھا جائے۔
(۲) حضوراکرم ﷺ کا درجہ جس طرح بھی ہوسکے ،گھٹایا جائے۔اس انگریز نے یہ انکشاف بھی کیا کہ 1920ء میں توہینِ رسالت کی کتاب لکھوانے میں یہی ادارہ شامل تھا۔اسی طرح کئی برس پہلے مرزاغلام احمد قادیانی کو جھوٹا نبی بناکر کھڑا کرنے والایہی ادارہ تھا ۔اسکی کتابوں کی بنیاد لندن کی اسی عمارت سے تیار ہوکر جاتی تھی۔ خبر ہے کہ سلمان رشدی کی کتاب لکھوانے میں بھی اسی ادارے کا ہاتھ ہے۔[بشکریہ : ماہنامہ ’الحیاۃ‘ انڈیا۰۰۰۰فروری2016 ]
برطانیہ میں جعلی علماء کس طرح تیار کیے جاتے ہیں ؟
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مسلمانوں کو بہت سے مسائل کے ساتھ جس ایک بڑے چیلنج کا سامنا ہے، وہ ہے باہمی اتحاد کی کمی،ایک خدا،ایک رسولؐ ،ایک کتاب،ایک امت ،لیکن پھر بھی امت اتنی پارہ پارہ کیوں ہے ۔ اس میں ہماری اپنی کوتاہیوں کے ساتھ اسلام کے دشمنوں کی بھی محنت شامل ہے۔ زیرِ نظر تحریر ایک ایسی ہی حقیقت ہے کہ کیوں ابھی تک ہم ایک چاند پر بھی متفق نہیں ہو پارہے ہیں؟۔یہ مضمون جولائی 2010 ءکے’اُردو ڈائجسٹ ‘میں شائع ہوا تھا۔
”نواب راحت خان سعید خان چھتاری 1940 ءکی دہائی میں ہندوستان کے صوبے اتر پردیش کے گورنر رہے ۔ انگریز حکومت نے انہیں یہ اہم عہدہ اس لئے عطا کیا کہ وہ مسلم لیگ اور کانگریس کی سیاست سے لاتعلق رہ کر انگریزوں کی وفاداری کا دم بھرتے تھے۔نواب چھتاری اپنی یادداشتیں لکھتے ہوئے انکشاف کرتے ہیں کہ ایک بار انہیں سرکاری ڈیوٹی پر لندن بلایا گیا ۔ان کے ایک پکے انگریز دوست نے، جو ہندوستان میں کلکٹر رہ چکاتھا ،نواب صاحب سے کہا: ”آئیے ! آپ کو ایک ایسی جگہ کی سیر کرائوں، جہاں میرے خیال میں آج تک کوئی ہندوستانی نہیں گیا۔“نواب صاحب خوش ہوگئے ۔انگریز کلکٹر نے پھر نواب صاحب سے پاسپورٹ مانگا کہ وہ جگہ دیکھنے کیلئے حکومت سے تحریری اجازت لینی ضروری تھی۔دو روز بعدکلکٹر اجازت نامہ ساتھ لے آیا اور کہا: ”ہم کل صبح چلیں گے“ لیکن میری موٹر میں‘موٹر وہاں لے جانے کی اجازت نہیں۔
اگلی صبح نواب صاحب اور وہ انگریز منزل کی طرف روانہ ہوئے ۔شہر سے باہر نکل کر بائیں طرف جنگل شروع ہوگیا ۔جنگل میں ایک پتلی سی سڑک موجودتھی۔جوں جوں چلتے گئے جنگل گھنا ہوتا گیا ۔سڑک کے دونوں جانب نہ کوئی ٹریفک تھا، نہ کوئی پیدل مسافر۔ نواب صاحب حیران بیٹھے اِدھراُدھر دیکھ رہے تھے۔ موٹرچلے چلتے آدھے گھنٹے سے زیادہ وقت گزر گیا۔تھوڑی دیربعد ایک بہت بڑا دروازہ نظر آیا ۔پھر دور سامنے ایک نہایت وسیع وعریض عمارت دکھائی دی،اس کے چاروں طرف کانٹے دار جھاڑیاں اور درختوں کی ایسی دیوار تھی، جسے عبور کرنا ناممکن تھا،عمارت کے چاروں طرف زبردست فوجی پہرہ تھا۔
اس عمارت کے باہر فوجیوں نے پاسپورٹ اور تحریری اجازت نامہ غور سے دیکھا اور حکم دیا کہ اپنی موٹر وہیں چھوڑ دیں اور آگے جو فوجی موٹر کھڑی ہے، اس میں سوار ہو جائیں،نواب صاحب اور انگریز کلکٹر پہرے داروں کی موٹر میں بیٹھ گئے۔ اب پھر اس پتلی سڑک پر سفر شروع ہوا،وہی گھنا جنگل اور دونوں طرف جنگلی درختوں کی دیواریں۔نواب صاحب گھبرانے لگے تو انگریز نے کہا :”بس منزل آنے والی ہے۔“آخر دورایک اور سرخ پتھر کی بڑی عمارت نظر آئی تو فوجی ڈرائیور نے موٹر روک دی اور کہا: ”یہاں سے آگے آپ صرف پیدل جا سکتے ہیں “۔راستے میں کلکٹر نے نواب صاحب سے کہا :”یاد رکھیں ‘کہ آپ یہاں صرف دیکھنے آئے ہیں، بولنے یا سوال کرنے کی بالکل اجازت نہیں ۔“
عمارت کے شروع میں دالان تھا ،اس کے پیچھے متعدد کمرے تھے ۔دالان میں داخل ہوئے تو ایک باریش نوجوان عربی کپڑے پہنے سر پر عربی رومال لپیٹے ایک کمرے سے نکلا۔ دوسرے کمرے سے ایسے ہی دو نوجوان نکلے ۔ پہلے نے عربی لہجے میں ”السلام علیکم“ کہا۔دوسرے نے ”وعلیکم السلام !کیا حال ہے ؟“نواب صاحب یہ منظر دیکھ کر حیران رہ گئے۔کچھ پوچھنا چاہتے تھے لیکن انگریز نے فوراً اشارے سے منع کردیا۔چلتے چلتے ایک کمرے کے دروازے پر پہنچے ،دیکھا کہ اندر مسجد جیسا فرش بچھاہے ،عربی لباس میں ملبوس متعدد طلبہ فرش پر بیٹھے ہیں، ان کے سامنے استاد بالکل اسی طرح بیٹھے سبق پڑھا رہے ہیں، جیسے اسلامی مدرسوں میں پڑھاتے ہیں۔طلباءعربی اور کبھی انگریزی میں استاد سے سوال بھی کرتے ۔نواب صاحب نے دیکھا کہ کسی کمرے میں قرآن کا درس ہورہا ہے ،کسی جگہ بخاری کا درس دیا جارہا ہے اور کہیں مسلم شریف کا ۔ایک کمرے میں مسلمانوں اور مسیحوں کے درمیان مناظرہ ہورہا تھا۔ ایک اور کمرے میں فقہی مسائل پر بات ہورہی تھی ۔سب سے بڑے کمرے میں قرآن مجید کا ترجمہ مختلف زبانوں میں سکھایا جارہا تھا۔
انہوں نے نوٹ کیا کہ ہر جگہ باریک مسئلے مسائل پر زور ہے ۔مثلاً وضو،روزے،نماز اور سجدہ سہو کے مسائل ، وراثت اور رضاعت کے جھگڑے ،لباس اور داڑھی کی وضع قطع،چاند کانظر آنا،غسل خانے کے آداب ،حج کے مناسک،بکرا ،دنبہ کیساہو،چھری کیسی ہو ،دنبہ حلال ہے یا حرام،حج بدل اور قضاءنمازوں کی بحث،عید کا دن کیسے طے کیاجائے اورحج کا کیسے؟پتلون پہنناجائزہے یا ناجائز ؟عورت کی پاکی کے جھگڑے ،امام کے پیچھے سورة الفاتحہ پڑھی جائے یا نہیں ؟تراویح آٹھ ہیں یا بیس؟وغیرہ ۔ایک استاد نے سوال کیا،پہلے عربی پھر انگریزی اور آخر میں نہایت شستہ اردو میں!”جماعت اب یہ بتائے کہ جادو ،نظربد،تعویذ ،گنڈہ آسیب کا سایہ برحق ہے یا نہیں ؟“پینتیس چالیس کی جماعت بہ یک آواز پہلے انگریزی میں بولیTRUE,TRUE پھر عربی میں یہی جواب دیا اور اردو میں!
ایک طالب علم نے کھڑے ہو کر سوال کیا: ”الاستاد ،قرآن تو کہتا ہے ہر شخص اپنے اعمال کا ذمہ دار خود ہے۔“استاد بولے: ”قرآن کی بات مت کرو،روایات اور ورد میں مسلمان کا ایمان پکا کرو۔ستاروں ،ہاتھ کی لکیروں ،مقدراور نصیب میں انہیں اُلجھاو۔“
یہ سب دیکھ کر وہ واپس ہوئے تو نواب چھتاری نے انگریز کلکٹر سے پوچھا: ”اتنے عظیم دینی مدرسے کو آپ نے کیوں چھپارکھا ہے؟“انگریز نے کہا: ”ارے بھئی ،ان سب میں کوئی مسلمان نہیں، یہ سب عیسائی ہیں،تعلیم مکمل ہونے پرانہیں مسلمان ملکوںخصوصاًمشرق وسطیٰ،ترکی،ایران اور ہندوستان بھیج دیا جاتا ہے۔وہاں پہنچ کر یہ کسی بڑی مسجد میں نماز پڑھتے ہیں ۔پھر نمازیوں سے کہتے ہیں کہ وہ یورپی مسلمان ہیں ۔انہوں نے مصر کی جامعہ الازہر میں تعلیم پائی ہے اور وہ مکمل عالم ہیں ۔یورپ میں اتنے اسلامی ادارے موجود نہیں کہ وہ تعلیم دے سکیں،وہ سردست تنخواہ نہیں چاہتے ،صرف کھانا،سر چھپانے کی جگہ درکار ہے۔وہ مؤذن،پیش امام ،بچوں کیلئے قرآن پڑھانے کے طورپراپنی خدمات پیش کرتے ہیں ،تعلیمی ادارہ ہو تو اس میں استاد مقررہوجاتے ہیں۔جمعہ کے خطبے تک دیتے ہیں۔“
نواب صاحب کے انگریز مہمان نے انہیں یہ بتا کر حیران کردیا کہ اِس’ عظیم مدرسے‘ کے بنیادی اہداف یہ ہیں:
(۱) مسلمانوں کو وظیفوں اور نظری مسائل میں الجھاکر قرآن سے دور رکھا جائے۔
(۲) حضوراکرم ﷺ کا درجہ جس طرح بھی ہوسکے ،گھٹایا جائے۔اس انگریز نے یہ انکشاف بھی کیا کہ 1920ء میں توہینِ رسالت کی کتاب لکھوانے میں یہی ادارہ شامل تھا۔اسی طرح کئی برس پہلے مرزاغلام احمد قادیانی کو جھوٹا نبی بناکر کھڑا کرنے والایہی ادارہ تھا ۔اسکی کتابوں کی بنیاد لندن کی اسی عمارت سے تیار ہوکر جاتی تھی۔ خبر ہے کہ سلمان رشدی کی کتاب لکھوانے میں بھی اسی ادارے کا ہاتھ ہے۔[بشکریہ : ماہنامہ ’الحیاۃ‘ انڈیا۰۰۰۰فروری2016 ]
. ایک درد مندانہ گزارش
ڈاکٹر ذاکر نائیک کسی مسلک کا نہیں اسلام کا ترجمان ہے اور بحیثیت مسلمان ہماری ذمہ داری ہے کہ سب ملکر اس کڑے وقت میں ان کا ساتھ دیں . . . . .
ہاں جزوی طور پر ڈاکٹر صاحب کی ہر بات سے متفق ہونا ضروری نہیں اختلاف رائے آپ کا حق ہے
لیکن خدا راہ مسلکی تعصب کی بنیاد پر دشمنان اسلام کا ساتھ مت دیں یاد رکھیں ہم پہلے مسلمان ہیں اور دیوبندی ،بریلوی ، اور اہلحدیث بعد میں ہیں .
ڈاکٹر ذاکر نائیک کسی مسلک کا نہیں اسلام کا ترجمان ہے اور بحیثیت مسلمان ہماری ذمہ داری ہے کہ سب ملکر اس کڑے وقت میں ان کا ساتھ دیں . . . . .
ہاں جزوی طور پر ڈاکٹر صاحب کی ہر بات سے متفق ہونا ضروری نہیں اختلاف رائے آپ کا حق ہے
لیکن خدا راہ مسلکی تعصب کی بنیاد پر دشمنان اسلام کا ساتھ مت دیں یاد رکھیں ہم پہلے مسلمان ہیں اور دیوبندی ،بریلوی ، اور اہلحدیث بعد میں ہیں .
कई बार हम सभी पर न जानने की सनक इस कदर सवार हो जाती है कि हम न जानने के कारण लाखों लोगों को मरवा देते हैं। इराक युद्ध के वक्त सुपर पावर मुल्कों के मुखियाओं ने क्या क्या कहा था आपको। जब स्मार्टफोन का पासवर्ड याद नहीं रहता तो ये कैसे याद रहेगा। ब्रिटेन में एक रिपोर्ट पर चर्चा हो रही है जो इराक युद्ध के कारणों के प्रति हमारी सार्वजनिक समझ को झकझोर देती है। जिन सैनिकों के दम पर या उनकी लाश को शहीद बताकर मीडिया आप पर राष्ट्रवाद की सनक थोपता है, इराक युद्ध में मारे गए ब्रिटेन के सैनिकों के परिवार वालों ने उस समय के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर के बारे में क्या कहा है, क्या आप जानना चाहेंगे। टोनी ब्लेयर को सैनिकों के परिवारवालों ने आतंकवादी कहा है। ब्रिटेन की सेना के प्रमुखों ने ब्लेयर से मांग की है कि वे इराक युद्ध के लिए माफी मांगे।
बुधवार को ब्रिटेन की संसद में सर जॉन चिल्कॉट ने 6000 पन्नों की एक जांच रिपोर्ट तैयार की है। इसे 26 लाख शब्दों के सहारे लिखा गया है और 12 वॉल्यूम में बांटा गया है। सात साल की मेहनत के बाद आई इस रिपोर्ट का नाम है द इराक इन्क्वायरी। सर चिल्कॉट को कहा गया था कि वे 2001 से 2009 के बीच इराक को लेकर ब्रिटेन की नीतियों का अध्ययन करें और बतायें कि क्या 2003 में इराक पर हमला करना सही और ज़रूरी था। यह सवाल इसलिए उठा क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन पहली बार किसी संप्रभु राष्ट्र पर हमला करने, कब्ज़ा करने के युद्ध में शामिल हुआ था। निश्चित रूप से सद्दाम हुसैन क्रूर तानाशाह था जिसने इराक के पड़ोसी देशों पर हमला किया था, अपने ही लोगों को मरवाया था और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बंदिशों का पालन नहीं किया था। सर चिल्काट की रिपोर्ट इस नतीजे पर पहुंची है कि ब्रिटेन ने युद्ध में शामिल होने का फैसला करने से पहले शांतिपूर्ण विकल्पों का चुनाव नहीं किया। उस वक्त सैनिक कार्रवाई अंतिम विकल्प नहीं थी।
उस वक्त युद्ध के ख़िलाफ़ दुनिया भर में प्रदर्शन हो रहे थे। ब्रिटेन में ही दस लाख से अधिक लोग सड़कों पर उतर आए थे। युद्ध के ख़िलाफ बात करने वालों को आतंकवाद का समर्थक बताया जाता था। जॉर्ज बुश जिसे इतिहास ने गर्त में फेंक दिया वो आतंकवाद से लड़ने वाला मसीहा बताया जाता था। अब उसी अमेरिका के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार डॉनल्ड ट्रंप ने कहा है कि सद्दाम हुसैन बहुत बुरा आदमी था पर क्या आपको पता है उसने क्या सही चीज़ की। उसने आतंकवादियों को मारा। आज इराक आतंकवादियों का हावर्ड बना हुआ है। आतंक का हावर्ड। बुश से लेकर ट्रंप तक हम एक काम नहीं कर पाए। वो ये कि अपने राजनेताओं का स्तर ऊंचा नहीं कर पाए। मूर्खता ही सत्य है। तब भी खेल था इनके लिए, आज भी खेल है। तब ऐसी ही भाषा में बुश दुनिया को बता रहे थे। सद्दाम हुसैन के पास मानवता को नष्ट करने वाला रसायनिक हथियार हैं। जिसे अंग्रेज़ी में वेपन ऑफ मास डिस्ट्रक्शन कहा जाता है। चिल्काट ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि इराक के पास रसायनिक हथियार होने के ख़तरों के जिन दावों के आधार पर पेश किया गया उनका कोई औचित्य नहीं था। तमाम चेतावनियों के बाद भी आक्रमण के बाद के नतीजों का सही आंकलन नहीं किया गया। सद्दाम हुसैन के बाद क्या होगा इसकी कोई तैयारी नहीं थी। सरकार ने जो लक्ष्य बताये थे, उसे हासिल करने में नाकाम रही।
बुधवार को हाउस ऑफ कामंस में इस रिपोर्ट को लेकर खूब बहस हुई। आज लेबर पार्टी विपक्ष में थी मगर 2003 में लेबर पार्टी सत्ता में थी और 43 साल के टोनी ब्लेयर की खूब धूम थी। उन्हें टोनी टेफलान कहा जाता था, यानी जिनकी छवि इतनी चिकनी थी कि कोई आरोप चिपकते ही नहीं थे। मगर ईमानदारी की वो छवि भी धोखा साबित हुई और उसके नाम पर ब्लेयर ने एक मुल्क के लाखों लोगों को मरवाने के खेल में शामिल होने का फैसला किया। इसके लिए अपने मंत्रिमंडल से झूठ बोला। अपनी संसद से झूठ बोला। इसलिए मुमकिन है कि दुनिया के राष्ट्र प्रमुख अपने देश की जनता से झूठ बोलते हैं। जब भी नेता कहे कि वही देश है इसका मतलब है कि वो अब झूठ बोल रहा है।
फैसला ब्लेयर का और माफी मांगी लेबर पार्टी के नेता जेर्मी कोर्बिन ने। कोर्बिन ने कहा कि मेरी माफी इराक के लोगों से है, वहां सैंकड़ों जाने चलीं गईं, वो देश अभी भी युद्ध के नतीजों को झेल रहा है। कोर्बिन ने ब्रिटेन के उन सैनिकों के परिवार से भी माफी मांगी है जो इराक युद्ध में मारे गए या अपने अंगों को गंवा कर लौटे। कहा कि सैनिकों ने तो अपना फर्ज़ निभाया लेकिन एक ऐसे युद्ध के लिए जिसमें उन्हें भेजा ही नहीं जाना चाहिए था। कोर्बिन ने ब्रिटेन की उन लाखों जनता से भी माफी मांगी है जो समझते थे कि इस फैसले के कारण ब्रिटेन के लोकतंत्र का कद छोटा हुआ है।
उन लोगों की आशंका सही साबित हुई। इराक में मरे हुए लोगों की गिनती के लिए एक वेबसाइट वजूद में आ गई है। ये हुआ है बदलाव। इसके अनुसार 2003 से लेकर अब तक युद्ध और धमाकों में 16 लाख से अधिक नागरिकों की मौत हुई है। सैनिकों की संख्या इसमें जोड़ दें तो आपके दिमाग की मेमरी क्रैश हो सकती है। इसके बाद भी टोनी ब्लेयर कहते हैं कि ऐसा फैसला फिर लेंगे। बुधवार को जब इस रिपोर्ट पर बहस हुई तो ब्लेयर ने कहा कि दस साल ब्रिटेन का प्रधानमंत्री रहते इराक़ पर युद्ध का फ़ैसला मेरे लिए सबसे कठिन, सबसे बड़ा और सबसे दर्द भरा था। कृपया ये नहीं कहिए कि मैं झूठ बोल रहा था या फिर मेरी मंशा कुछ बेईमानी भरी थी। एक भी दिन ऐसा नहीं बीतता जब मैं ये नहीं सोचता कि क्या हुआ, अमेरिका की अगुवाई में आक्रमण में साथ देने का मेरा फ़ैसला सही था क्योंकि सद्दाम हुसैन के सत्ता में ना रहने के बाद दुनिया एक बेहतर जगह हो गई है।
क्या वाकई दुनिया बेहतर हुई है। ये सिर्फ ब्लेयर को दिख रहा है या आपको भी दिखता है। जिसका डर दिखा कर इराक पर युद्ध थोपा गया और लाखों लोग मार दिये गए, अब उसी देश की रिपोर्ट कह रही है कि उस डर का कोई औचित्य नहीं था। सद्दाम के पास रसायनिक हथियार होने की बात गलत थी। 18 मार्च 2003 का टोनी ब्लेयर का भाषण जो उन्होंने हाउस ऑफ़ कॉमन्स में दिया था, उसमें कहते हैं कि 'यह मुद्दा इतना ज़रूरी क्यों है? क्योंकि इसका नतीजा इराक़ी शासन की नियति से अधिक और इराक़ी जनता के भविष्य से अधिक तय करेगा जो सद्दाम के दौर में बुरी तरह पीड़ित हैं। ये तय करेगा कि इक्कीसवीं सदी में सुरक्षा से जुड़ी मुख्य चुनौती से ब्रिटेन और दुनिया कैसे निपटेगी। ये संयुक्त राष्ट्र का आगे का रास्ता तय करेगा, यूरोप और अमेरिका के रिश्तों को तय करेगा, यूरोपियन यूनियन के अंदरूनी रिश्तों को तय करेगा और ये भी कि अमेरिका बाकी दुनिया के साथ कैसे व्यवहार करे। ये अगली पीढ़ी के लिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति के तौर तरीकों को तय करेगा।'
एक युद्ध से इतना कुछ तय होने वाला है जैसे ब्लेयर साहब पहली तारीख को झोला लेकर परचून की दुकान से राशन लाने निकले हों। ब्लेयर ने अपने मंत्रिमंडल से लेकर संसद तक को धोखे में रखा। अगर यू ट्यूब पर मौजूद प्रवचनों से प्रेरित होकर आतंकवाद फैलता है तो ब्लेयर जैसों के फैसले से दुनिया में जो आज तक तबाही मची है, उसे आप क्या कहना चाहेंगे। मार्च 2003 में ब्लेयर ब्रिटिश संसद में झूठ बोल रहे थे क्योंकि आठ महीना पहले ही जुलाई 2002 में वे अमेरिका के राष्ट्रपति बुश को लिख चुके थे कि "I will be with you, whatever." कुछ भी हो जाए मैं आपके साथ हूं। अब आइये मीडिया के खेल पर। मीडिया जब भी राष्ट्रवाद का नारा लगाए तब समझ जाइयेगा कि कुछ ऐसा खेल है जो आपकी समझ से बाहर है। अमेरिकी मीडिया सुपर पावर मुल्क होने के नशे की गोली बांट रहा था। उस वक्त मीडिया की कुछ हेडलाइन निकाली हैं।
पहले लंदन का एक अखबार है द सन। 2003 का सन का यह पहला पन्ना है। इसने लिखा था सन बैक्स ब्लेयर। ब्लेयर के हाथ में सन है और सन अखबार ब्लेयर के समर्थन में है। जब अखबार या टीवी प्रधानमंत्री का खुलेआम समर्थन का दावा करे तो बिना एनासिन खाए समझ जाइयेगा कि इसमें कोई खेल है। यही सन अखबार चिल्काट रिपोर्ट के बाद हेडलाइन बनाता है कि वेपन ऑफ मास डिसेप्शन। हिन्दी में मतलब सामूहिक धोखे का हथियार। भारत में कई मीडिया संस्थान ठीक यही कर रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि अखबारों ने आलोचना नहीं की होगी मगर युद्ध का उन्माद मीडिया ने फैलाया। सुपर पावर का सपना भी उसी उन्माद का प्रोजेक्ट है। जो आपको रखेगा ग़रीब मगर दिखायेगा उड़ते हुए रॉकेट का सपना।
डेली मिरर ब्रिटेन का अखबार है। इस अखबार ने तब जो कहा था वो दस साल बाद सही निकला। 29 जनवरी 2003 के अखबार के पहले पन्ने पर छपा था, ब्लेयर की दोनों हथेलियां ख़ून से सनी हैं। लिखा था ब्लड ऑन हिज़ हैंड्स- टोनी ब्लेयर। चिल्काट रिपोर्ट से पहले ही अक्टूबर 2015 में ही डेली मिरर ने लिखा था दस साल बाद माफी मांगने का कोई मतलब नहीं। रिपोर्ट के बाद इस अखबार ने ब्लेयर के उस सीक्रेट कथन को लिखा है जो उन्होंने बुश से कहा था। मैं हर हाल में आपके साथ रहूंगा।
मुझे नहीं मालूम तब ब्रिटेन में आजकल टाइप के अंध राष्ट्रभक्त होते थे या नहीं। तब डेली मिरर को कितनी गाली पड़ी होगी। मगर मीडिया और कारपोरेट और राष्ट्रप्रमुखों के खेल को ठीक से समझना होगा। हालांकि ये खेल इतना बारीक होता है कि आपके लिए क्या मीडिया के लिए भी समझना आसान नहीं होता है।
इराक युद्ध ने मीडिया को भी बदल दिया था। युद्ध का लाइव कवरेज कराया गया। इम्बेडेड जर्नलिज्म का जुमला काफी चला था उस वक्त। टीवी के रिपोर्टर टैंकों में लादकर मोर्चे पर ले जाए गए और बूम बाम का कवरेज दिखाने लगे। रिपोर्टरों को बहादुरी का इनाम मिला, वे युद्ध कवरेज के विशेषज्ञ बने और बदले में लाखों लोग मर गए। पूरी दुनिया में इस युद्ध का सीधा प्रसारण हुआ था। कहां तो लोगों को रॉकेट और बम धमाकों से सहम जाना चाहिए था मगर टीवी ने उनके भीतर मिसाइल और टैंक के रोमांच भर दिये। चिल्काट रिपोर्ट के बाद ब्रिटेन के अखबार बदल गए हैं। The Times लिखता है Blair's Private war। Daily Star लिखता है Blair is world's worst Terrorist। Daily Mail - A monster of delusion.
यह रिपोर्ट इराक युद्ध के बारे में हमारी समझ बदलती है, अगर बदलती है तो उस समझ के आधार पर दुनिया कैसी होती, हम इसकी भी कल्पना करेंगे। कई सवालों के साथ चिल्काट की रिपोर्ट को समझेंगे कि आखिर ये गेम था क्या जिसके बहाने हम पर इराक पर और उसके बाद के नतीजों पर पूरी दुनिया पर युद्ध थोपा गया-आतंकवाद थोपा गया।
#प्राइम_टाइम_इंट्रो#प्राइम_टाइम_इंट्रोv
बुधवार को ब्रिटेन की संसद में सर जॉन चिल्कॉट ने 6000 पन्नों की एक जांच रिपोर्ट तैयार की है। इसे 26 लाख शब्दों के सहारे लिखा गया है और 12 वॉल्यूम में बांटा गया है। सात साल की मेहनत के बाद आई इस रिपोर्ट का नाम है द इराक इन्क्वायरी। सर चिल्कॉट को कहा गया था कि वे 2001 से 2009 के बीच इराक को लेकर ब्रिटेन की नीतियों का अध्ययन करें और बतायें कि क्या 2003 में इराक पर हमला करना सही और ज़रूरी था। यह सवाल इसलिए उठा क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन पहली बार किसी संप्रभु राष्ट्र पर हमला करने, कब्ज़ा करने के युद्ध में शामिल हुआ था। निश्चित रूप से सद्दाम हुसैन क्रूर तानाशाह था जिसने इराक के पड़ोसी देशों पर हमला किया था, अपने ही लोगों को मरवाया था और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बंदिशों का पालन नहीं किया था। सर चिल्काट की रिपोर्ट इस नतीजे पर पहुंची है कि ब्रिटेन ने युद्ध में शामिल होने का फैसला करने से पहले शांतिपूर्ण विकल्पों का चुनाव नहीं किया। उस वक्त सैनिक कार्रवाई अंतिम विकल्प नहीं थी।
उस वक्त युद्ध के ख़िलाफ़ दुनिया भर में प्रदर्शन हो रहे थे। ब्रिटेन में ही दस लाख से अधिक लोग सड़कों पर उतर आए थे। युद्ध के ख़िलाफ बात करने वालों को आतंकवाद का समर्थक बताया जाता था। जॉर्ज बुश जिसे इतिहास ने गर्त में फेंक दिया वो आतंकवाद से लड़ने वाला मसीहा बताया जाता था। अब उसी अमेरिका के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार डॉनल्ड ट्रंप ने कहा है कि सद्दाम हुसैन बहुत बुरा आदमी था पर क्या आपको पता है उसने क्या सही चीज़ की। उसने आतंकवादियों को मारा। आज इराक आतंकवादियों का हावर्ड बना हुआ है। आतंक का हावर्ड। बुश से लेकर ट्रंप तक हम एक काम नहीं कर पाए। वो ये कि अपने राजनेताओं का स्तर ऊंचा नहीं कर पाए। मूर्खता ही सत्य है। तब भी खेल था इनके लिए, आज भी खेल है। तब ऐसी ही भाषा में बुश दुनिया को बता रहे थे। सद्दाम हुसैन के पास मानवता को नष्ट करने वाला रसायनिक हथियार हैं। जिसे अंग्रेज़ी में वेपन ऑफ मास डिस्ट्रक्शन कहा जाता है। चिल्काट ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि इराक के पास रसायनिक हथियार होने के ख़तरों के जिन दावों के आधार पर पेश किया गया उनका कोई औचित्य नहीं था। तमाम चेतावनियों के बाद भी आक्रमण के बाद के नतीजों का सही आंकलन नहीं किया गया। सद्दाम हुसैन के बाद क्या होगा इसकी कोई तैयारी नहीं थी। सरकार ने जो लक्ष्य बताये थे, उसे हासिल करने में नाकाम रही।
बुधवार को हाउस ऑफ कामंस में इस रिपोर्ट को लेकर खूब बहस हुई। आज लेबर पार्टी विपक्ष में थी मगर 2003 में लेबर पार्टी सत्ता में थी और 43 साल के टोनी ब्लेयर की खूब धूम थी। उन्हें टोनी टेफलान कहा जाता था, यानी जिनकी छवि इतनी चिकनी थी कि कोई आरोप चिपकते ही नहीं थे। मगर ईमानदारी की वो छवि भी धोखा साबित हुई और उसके नाम पर ब्लेयर ने एक मुल्क के लाखों लोगों को मरवाने के खेल में शामिल होने का फैसला किया। इसके लिए अपने मंत्रिमंडल से झूठ बोला। अपनी संसद से झूठ बोला। इसलिए मुमकिन है कि दुनिया के राष्ट्र प्रमुख अपने देश की जनता से झूठ बोलते हैं। जब भी नेता कहे कि वही देश है इसका मतलब है कि वो अब झूठ बोल रहा है।
फैसला ब्लेयर का और माफी मांगी लेबर पार्टी के नेता जेर्मी कोर्बिन ने। कोर्बिन ने कहा कि मेरी माफी इराक के लोगों से है, वहां सैंकड़ों जाने चलीं गईं, वो देश अभी भी युद्ध के नतीजों को झेल रहा है। कोर्बिन ने ब्रिटेन के उन सैनिकों के परिवार से भी माफी मांगी है जो इराक युद्ध में मारे गए या अपने अंगों को गंवा कर लौटे। कहा कि सैनिकों ने तो अपना फर्ज़ निभाया लेकिन एक ऐसे युद्ध के लिए जिसमें उन्हें भेजा ही नहीं जाना चाहिए था। कोर्बिन ने ब्रिटेन की उन लाखों जनता से भी माफी मांगी है जो समझते थे कि इस फैसले के कारण ब्रिटेन के लोकतंत्र का कद छोटा हुआ है।
उन लोगों की आशंका सही साबित हुई। इराक में मरे हुए लोगों की गिनती के लिए एक वेबसाइट वजूद में आ गई है। ये हुआ है बदलाव। इसके अनुसार 2003 से लेकर अब तक युद्ध और धमाकों में 16 लाख से अधिक नागरिकों की मौत हुई है। सैनिकों की संख्या इसमें जोड़ दें तो आपके दिमाग की मेमरी क्रैश हो सकती है। इसके बाद भी टोनी ब्लेयर कहते हैं कि ऐसा फैसला फिर लेंगे। बुधवार को जब इस रिपोर्ट पर बहस हुई तो ब्लेयर ने कहा कि दस साल ब्रिटेन का प्रधानमंत्री रहते इराक़ पर युद्ध का फ़ैसला मेरे लिए सबसे कठिन, सबसे बड़ा और सबसे दर्द भरा था। कृपया ये नहीं कहिए कि मैं झूठ बोल रहा था या फिर मेरी मंशा कुछ बेईमानी भरी थी। एक भी दिन ऐसा नहीं बीतता जब मैं ये नहीं सोचता कि क्या हुआ, अमेरिका की अगुवाई में आक्रमण में साथ देने का मेरा फ़ैसला सही था क्योंकि सद्दाम हुसैन के सत्ता में ना रहने के बाद दुनिया एक बेहतर जगह हो गई है।
क्या वाकई दुनिया बेहतर हुई है। ये सिर्फ ब्लेयर को दिख रहा है या आपको भी दिखता है। जिसका डर दिखा कर इराक पर युद्ध थोपा गया और लाखों लोग मार दिये गए, अब उसी देश की रिपोर्ट कह रही है कि उस डर का कोई औचित्य नहीं था। सद्दाम के पास रसायनिक हथियार होने की बात गलत थी। 18 मार्च 2003 का टोनी ब्लेयर का भाषण जो उन्होंने हाउस ऑफ़ कॉमन्स में दिया था, उसमें कहते हैं कि 'यह मुद्दा इतना ज़रूरी क्यों है? क्योंकि इसका नतीजा इराक़ी शासन की नियति से अधिक और इराक़ी जनता के भविष्य से अधिक तय करेगा जो सद्दाम के दौर में बुरी तरह पीड़ित हैं। ये तय करेगा कि इक्कीसवीं सदी में सुरक्षा से जुड़ी मुख्य चुनौती से ब्रिटेन और दुनिया कैसे निपटेगी। ये संयुक्त राष्ट्र का आगे का रास्ता तय करेगा, यूरोप और अमेरिका के रिश्तों को तय करेगा, यूरोपियन यूनियन के अंदरूनी रिश्तों को तय करेगा और ये भी कि अमेरिका बाकी दुनिया के साथ कैसे व्यवहार करे। ये अगली पीढ़ी के लिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति के तौर तरीकों को तय करेगा।'
एक युद्ध से इतना कुछ तय होने वाला है जैसे ब्लेयर साहब पहली तारीख को झोला लेकर परचून की दुकान से राशन लाने निकले हों। ब्लेयर ने अपने मंत्रिमंडल से लेकर संसद तक को धोखे में रखा। अगर यू ट्यूब पर मौजूद प्रवचनों से प्रेरित होकर आतंकवाद फैलता है तो ब्लेयर जैसों के फैसले से दुनिया में जो आज तक तबाही मची है, उसे आप क्या कहना चाहेंगे। मार्च 2003 में ब्लेयर ब्रिटिश संसद में झूठ बोल रहे थे क्योंकि आठ महीना पहले ही जुलाई 2002 में वे अमेरिका के राष्ट्रपति बुश को लिख चुके थे कि "I will be with you, whatever." कुछ भी हो जाए मैं आपके साथ हूं। अब आइये मीडिया के खेल पर। मीडिया जब भी राष्ट्रवाद का नारा लगाए तब समझ जाइयेगा कि कुछ ऐसा खेल है जो आपकी समझ से बाहर है। अमेरिकी मीडिया सुपर पावर मुल्क होने के नशे की गोली बांट रहा था। उस वक्त मीडिया की कुछ हेडलाइन निकाली हैं।
पहले लंदन का एक अखबार है द सन। 2003 का सन का यह पहला पन्ना है। इसने लिखा था सन बैक्स ब्लेयर। ब्लेयर के हाथ में सन है और सन अखबार ब्लेयर के समर्थन में है। जब अखबार या टीवी प्रधानमंत्री का खुलेआम समर्थन का दावा करे तो बिना एनासिन खाए समझ जाइयेगा कि इसमें कोई खेल है। यही सन अखबार चिल्काट रिपोर्ट के बाद हेडलाइन बनाता है कि वेपन ऑफ मास डिसेप्शन। हिन्दी में मतलब सामूहिक धोखे का हथियार। भारत में कई मीडिया संस्थान ठीक यही कर रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि अखबारों ने आलोचना नहीं की होगी मगर युद्ध का उन्माद मीडिया ने फैलाया। सुपर पावर का सपना भी उसी उन्माद का प्रोजेक्ट है। जो आपको रखेगा ग़रीब मगर दिखायेगा उड़ते हुए रॉकेट का सपना।
डेली मिरर ब्रिटेन का अखबार है। इस अखबार ने तब जो कहा था वो दस साल बाद सही निकला। 29 जनवरी 2003 के अखबार के पहले पन्ने पर छपा था, ब्लेयर की दोनों हथेलियां ख़ून से सनी हैं। लिखा था ब्लड ऑन हिज़ हैंड्स- टोनी ब्लेयर। चिल्काट रिपोर्ट से पहले ही अक्टूबर 2015 में ही डेली मिरर ने लिखा था दस साल बाद माफी मांगने का कोई मतलब नहीं। रिपोर्ट के बाद इस अखबार ने ब्लेयर के उस सीक्रेट कथन को लिखा है जो उन्होंने बुश से कहा था। मैं हर हाल में आपके साथ रहूंगा।
मुझे नहीं मालूम तब ब्रिटेन में आजकल टाइप के अंध राष्ट्रभक्त होते थे या नहीं। तब डेली मिरर को कितनी गाली पड़ी होगी। मगर मीडिया और कारपोरेट और राष्ट्रप्रमुखों के खेल को ठीक से समझना होगा। हालांकि ये खेल इतना बारीक होता है कि आपके लिए क्या मीडिया के लिए भी समझना आसान नहीं होता है।
इराक युद्ध ने मीडिया को भी बदल दिया था। युद्ध का लाइव कवरेज कराया गया। इम्बेडेड जर्नलिज्म का जुमला काफी चला था उस वक्त। टीवी के रिपोर्टर टैंकों में लादकर मोर्चे पर ले जाए गए और बूम बाम का कवरेज दिखाने लगे। रिपोर्टरों को बहादुरी का इनाम मिला, वे युद्ध कवरेज के विशेषज्ञ बने और बदले में लाखों लोग मर गए। पूरी दुनिया में इस युद्ध का सीधा प्रसारण हुआ था। कहां तो लोगों को रॉकेट और बम धमाकों से सहम जाना चाहिए था मगर टीवी ने उनके भीतर मिसाइल और टैंक के रोमांच भर दिये। चिल्काट रिपोर्ट के बाद ब्रिटेन के अखबार बदल गए हैं। The Times लिखता है Blair's Private war। Daily Star लिखता है Blair is world's worst Terrorist। Daily Mail - A monster of delusion.
यह रिपोर्ट इराक युद्ध के बारे में हमारी समझ बदलती है, अगर बदलती है तो उस समझ के आधार पर दुनिया कैसी होती, हम इसकी भी कल्पना करेंगे। कई सवालों के साथ चिल्काट की रिपोर्ट को समझेंगे कि आखिर ये गेम था क्या जिसके बहाने हम पर इराक पर और उसके बाद के नतीजों पर पूरी दुनिया पर युद्ध थोपा गया-आतंकवाद थोपा गया।
#प्राइम_टाइम_इंट्रो#प्राइम_टाइम_इंट्रोv
ذاکر نایک کو ضرور گرفتار کیجئے --
ابھی ذاکر نایک کے پیس تی وی اور انکے بیانات کی جانچ چلرہی ہے .،مگر میڈیا نے انھیں ایک خوفناک دہشتگرد کے طور پر پروجیکٹ کرنا شروع کر دیا .٢٠٠٢ میں گجرات پر لکھتے ہوئے ، میں نے ایک سروے کا ذکر کیا تھا .حکومت کے کچھ لوگ یا تفتیشی ایجنسی کے کچھ لوگ ایک مدرسے میں جاتے ہیں.پوچھتے ہیں ..یہاں کیا پڑھایا جاتا ہے ؟ جواب ملتا ہے --قران --پوچھا جاتا ہے ،اچھا وہی قران جو افغانستان میں پڑھایا جاتا ہے .جواب ملتا ہے .جی ...مدرسے کو لے کر رپورٹ میں لکھا جاتا ہے ---یہاں دہشت گردی کی تعلیم دی جاتی ہے -
ممکن ہے ،پیس ٹی وی کی جانچ اور ذاکر نایک کی تقریروں میں الله ،محمد ،قرآن ،مسلمان اور اسلام کا ذکر پایا جائے ،تو ایجنسیاں آرام سے ذاکر نایک کو دہشت گرد ثابت کر ڈینگی ...
میں ذاکر نایک سے اختلاف رکھتے ہوئے بھی انکے ساتھ ہوں .کیونکہ مذھب کی تبلیغ اگر جرم ہے تو ہزاروں بھکتی اور دھارمک چینلوں پر پابندی کیوں نہیں عاید کی جاتی .ان چینلوں پر کوئی دیش بھکتی یا ہندو مسلم بھائی بھائی کا سبق نہیں پڑھایا جاتا . عیسائیت کو فروغ دینے کے لئے بھی کیی ٹی وی چینل ہیں .ان مذہبی چنلوں میں اپنے اپنے مذھب کو سب سے بہتر کہنے کی آزادی ہے تو ذاکر نایک سے یہ حق کیوں چھینا جا رہا ہے ؟ جبکہ دھارمک اور بھکتی چنلوں پپر مذہب کی آڑ میں نفرت کی بارش کرنے والوں کی کویی کمی نہیں .لیکن یہ چینل کچھ بھی کہنے اور دکھانے کے لئے آزاد ہیں .کانگریس نے بھی کسی نیے اردو یا اسلامی چینل کی آمد پر پابندی لگایی تھی .کویی اردو یا اسلامی چینل لانا چاہے تو حکومت حوالہ اور دہشت گردوں سے ملنے والی امداد تک پھچ جاتی ہے .لیکن بھکتی اور دھارمک چینل کے لئے کویی تفتیشی اجنسی نہیں بیٹھایی جاتی .حکومت کویی بھی رہی ہو ،مسلمانوں کے لئے سب کے نظریے ایک جیسے رہے ہیں .
میڈیا کی پبلسٹی حیران کرنے والی ہے .ایسا لگتا ہے جیسے صرف ذکر نایک نہیں بلکہ ہندوستان کا ہر مسلمان دہشتگرد ہے .حکومت یہی چاہتی ہے .کل ہندوستان کے ہر مسلمان پر دہشت گردی کی تلوار جھول رہی ہوگی ..میں کہتا ہوں ذاکر نایک کو ضرورگرفتار کیجئے مگر ..
--- مودی کبینٹ اپنے وزرا کے دو برسوں کی تقریریں دیکھ لیں .انکی جانچ کریں .وہاں زہر ہی زہر ملے گا .پوری کبنٹ کو سزا دلایں .
--- شروعات بابری مسجد سے کریں ،جس نے نفرت کو ہندوستان میں عام کیا ..دہشت گردی کی بنیاد رکھی .بابری مسجد کے ملزمین کو فوری طور پر سزا دلایں .
-- سادھوی پراچی ،یوگی آدتیہ ناتھ ،گری راج سنگھ ،سںگیت سوم ،انوپریہ ،مہیش پرساد ،یہ فہرست بہت لمبی ہے ...ان سب کے دہشت آمیز بیانات کو دیکھا جائے تو یہ سارے غدّار اور دہشت گرد نکلیںگے ..ان سب کو گرفتار کیا جائے ..
--- پروین توگڑیا کو سزا دی جائے .مسلمانوں کو بار بار پاکستان بھیجنے والے اور فسادات کو ووٹ کے لئے ضروری سمجھنے والے امیت شاہ کو سزا دی جائے ،
--- گجرات قتل عام میں شامل ہر دہشت گرد کو گرفتار کیا جائے
---مٹن کو بیف بنا کر خالق اور جتنے مسلمانوں کو قتل کیا گیا ،ان سب کو گرفتار کیا جائے
---مظفر نگر سے لے کر کرانہ میں مسلمانوں کو نکالنے کا جو ڈرامہ پیش کیا گیا ،وہ کسی دہشتگردی سے کم نہیں ..
ایسی ہزاروں مثالیں ہیں ..پہلے انہیں سزا دلوائے ..پھر ذاکر نایک کو ضرور گرفتار کیجئے .
ابھی عراق وار پر جو رپورٹ آیی ہے وہ چونکانے والی رپورٹ ہے .لندن کے اخباروں نے ٹونی بلیئر کو سب سے خطرناک دہشت گرد بتاتے ہوئے بش اور بلیئر کو قانونی گرفت میں لینے کی مانگ کی ہے . عالمی غنڈہ گردی کی اس سے بد ترین مثال نہیں ملے گی کہ جھوٹھے دعوے کے گئے ..عراق ،لیبیا سب کو تباہ و برباد کر دیا گیا ..بنگلہ دیش میں ہوئے بم دھماکوں کے بعد اب یہ آگ خوفناک طریقے سے ہندوستان تک پھچ گیی ہے .ذاکر نایک صرف ایک علامت ،مہرہ ہندوستان کے تمام مسلمان ..کیا بھکتی چینلوں اور آر ایس ایس کے لیڈران کی تقریریں سن کر سارے ہندو انتہا پسند ہو گئے ؟اگر نہیں تو پھر اسلام اور اسلامی فلسفوں کی گفتگو سے مسلم نوجوان انتہا پسند کیسے ہو سکتے ہیں ..؟
اس جھوٹ اور سازش کو سمجھے ..آنے والے کل میں ہندوستان کے ہر مسلمان کو دہشت گرد اور انتہا پسند قرار دیا جائے گا ..اس جھوٹ سے جنگ لڑنے کی ضرورت ہے ...غور کیجئے ...آپ کے معصوم بچوں تک نفرت کی یہ آگ آ پہچی ہے ....نشانہ آپ ہیں .آپکے معصوم بچے ہیں ....
مسلک اور عقیدوں کو طاق پر رکھیے ..اتحاد کا ثبوت دیجئے ...ورنہ عالمی سطح پر کیا ہوگا ،نہیں جانتا --ہندوستان میں آپ برباد کر دئے جاینگے-
(احمد اظہار، روزنامہ اردو نیوز، ممبئی )
ابھی ذاکر نایک کے پیس تی وی اور انکے بیانات کی جانچ چلرہی ہے .،مگر میڈیا نے انھیں ایک خوفناک دہشتگرد کے طور پر پروجیکٹ کرنا شروع کر دیا .٢٠٠٢ میں گجرات پر لکھتے ہوئے ، میں نے ایک سروے کا ذکر کیا تھا .حکومت کے کچھ لوگ یا تفتیشی ایجنسی کے کچھ لوگ ایک مدرسے میں جاتے ہیں.پوچھتے ہیں ..یہاں کیا پڑھایا جاتا ہے ؟ جواب ملتا ہے --قران --پوچھا جاتا ہے ،اچھا وہی قران جو افغانستان میں پڑھایا جاتا ہے .جواب ملتا ہے .جی ...مدرسے کو لے کر رپورٹ میں لکھا جاتا ہے ---یہاں دہشت گردی کی تعلیم دی جاتی ہے -
ممکن ہے ،پیس ٹی وی کی جانچ اور ذاکر نایک کی تقریروں میں الله ،محمد ،قرآن ،مسلمان اور اسلام کا ذکر پایا جائے ،تو ایجنسیاں آرام سے ذاکر نایک کو دہشت گرد ثابت کر ڈینگی ...
میں ذاکر نایک سے اختلاف رکھتے ہوئے بھی انکے ساتھ ہوں .کیونکہ مذھب کی تبلیغ اگر جرم ہے تو ہزاروں بھکتی اور دھارمک چینلوں پر پابندی کیوں نہیں عاید کی جاتی .ان چینلوں پر کوئی دیش بھکتی یا ہندو مسلم بھائی بھائی کا سبق نہیں پڑھایا جاتا . عیسائیت کو فروغ دینے کے لئے بھی کیی ٹی وی چینل ہیں .ان مذہبی چنلوں میں اپنے اپنے مذھب کو سب سے بہتر کہنے کی آزادی ہے تو ذاکر نایک سے یہ حق کیوں چھینا جا رہا ہے ؟ جبکہ دھارمک اور بھکتی چنلوں پپر مذہب کی آڑ میں نفرت کی بارش کرنے والوں کی کویی کمی نہیں .لیکن یہ چینل کچھ بھی کہنے اور دکھانے کے لئے آزاد ہیں .کانگریس نے بھی کسی نیے اردو یا اسلامی چینل کی آمد پر پابندی لگایی تھی .کویی اردو یا اسلامی چینل لانا چاہے تو حکومت حوالہ اور دہشت گردوں سے ملنے والی امداد تک پھچ جاتی ہے .لیکن بھکتی اور دھارمک چینل کے لئے کویی تفتیشی اجنسی نہیں بیٹھایی جاتی .حکومت کویی بھی رہی ہو ،مسلمانوں کے لئے سب کے نظریے ایک جیسے رہے ہیں .
میڈیا کی پبلسٹی حیران کرنے والی ہے .ایسا لگتا ہے جیسے صرف ذکر نایک نہیں بلکہ ہندوستان کا ہر مسلمان دہشتگرد ہے .حکومت یہی چاہتی ہے .کل ہندوستان کے ہر مسلمان پر دہشت گردی کی تلوار جھول رہی ہوگی ..میں کہتا ہوں ذاکر نایک کو ضرورگرفتار کیجئے مگر ..
--- مودی کبینٹ اپنے وزرا کے دو برسوں کی تقریریں دیکھ لیں .انکی جانچ کریں .وہاں زہر ہی زہر ملے گا .پوری کبنٹ کو سزا دلایں .
--- شروعات بابری مسجد سے کریں ،جس نے نفرت کو ہندوستان میں عام کیا ..دہشت گردی کی بنیاد رکھی .بابری مسجد کے ملزمین کو فوری طور پر سزا دلایں .
-- سادھوی پراچی ،یوگی آدتیہ ناتھ ،گری راج سنگھ ،سںگیت سوم ،انوپریہ ،مہیش پرساد ،یہ فہرست بہت لمبی ہے ...ان سب کے دہشت آمیز بیانات کو دیکھا جائے تو یہ سارے غدّار اور دہشت گرد نکلیںگے ..ان سب کو گرفتار کیا جائے ..
--- پروین توگڑیا کو سزا دی جائے .مسلمانوں کو بار بار پاکستان بھیجنے والے اور فسادات کو ووٹ کے لئے ضروری سمجھنے والے امیت شاہ کو سزا دی جائے ،
--- گجرات قتل عام میں شامل ہر دہشت گرد کو گرفتار کیا جائے
---مٹن کو بیف بنا کر خالق اور جتنے مسلمانوں کو قتل کیا گیا ،ان سب کو گرفتار کیا جائے
---مظفر نگر سے لے کر کرانہ میں مسلمانوں کو نکالنے کا جو ڈرامہ پیش کیا گیا ،وہ کسی دہشتگردی سے کم نہیں ..
ایسی ہزاروں مثالیں ہیں ..پہلے انہیں سزا دلوائے ..پھر ذاکر نایک کو ضرور گرفتار کیجئے .
ابھی عراق وار پر جو رپورٹ آیی ہے وہ چونکانے والی رپورٹ ہے .لندن کے اخباروں نے ٹونی بلیئر کو سب سے خطرناک دہشت گرد بتاتے ہوئے بش اور بلیئر کو قانونی گرفت میں لینے کی مانگ کی ہے . عالمی غنڈہ گردی کی اس سے بد ترین مثال نہیں ملے گی کہ جھوٹھے دعوے کے گئے ..عراق ،لیبیا سب کو تباہ و برباد کر دیا گیا ..بنگلہ دیش میں ہوئے بم دھماکوں کے بعد اب یہ آگ خوفناک طریقے سے ہندوستان تک پھچ گیی ہے .ذاکر نایک صرف ایک علامت ،مہرہ ہندوستان کے تمام مسلمان ..کیا بھکتی چینلوں اور آر ایس ایس کے لیڈران کی تقریریں سن کر سارے ہندو انتہا پسند ہو گئے ؟اگر نہیں تو پھر اسلام اور اسلامی فلسفوں کی گفتگو سے مسلم نوجوان انتہا پسند کیسے ہو سکتے ہیں ..؟
اس جھوٹ اور سازش کو سمجھے ..آنے والے کل میں ہندوستان کے ہر مسلمان کو دہشت گرد اور انتہا پسند قرار دیا جائے گا ..اس جھوٹ سے جنگ لڑنے کی ضرورت ہے ...غور کیجئے ...آپ کے معصوم بچوں تک نفرت کی یہ آگ آ پہچی ہے ....نشانہ آپ ہیں .آپکے معصوم بچے ہیں ....
مسلک اور عقیدوں کو طاق پر رکھیے ..اتحاد کا ثبوت دیجئے ...ورنہ عالمی سطح پر کیا ہوگا ،نہیں جانتا --ہندوستان میں آپ برباد کر دئے جاینگے-
(احمد اظہار، روزنامہ اردو نیوز، ممبئی )
ایک درد مندانہ گزارش
ڈاکٹر ذاکر نائیک کسی مسلک کا نہیں اسلام کا ترجمان ہے اور بحیثیت مسلمان ہماری ذمہ داری ہے کہ سب ملکر اس کڑے وقت میں ان کا ساتھ دیں . . . . .
ہاں جزوی طور پر ڈاکٹر صاحب کی ہر بات سے متفق ہونا ضروری نہیں اختلاف رائے آپ کا حق ہے
لیکن خدا راہ مسلکی تعصب کی بنیاد پر دشمنان اسلام کا ساتھ مت دیں یاد رکھیں ہم پہلے مسلمان ہیں اور دیوبندی ،بریلوی ، اور اہلحدیث بعد میں ہیں .
ڈاکٹر ذاکر نائیک کسی مسلک کا نہیں اسلام کا ترجمان ہے اور بحیثیت مسلمان ہماری ذمہ داری ہے کہ سب ملکر اس کڑے وقت میں ان کا ساتھ دیں . . . . .
ہاں جزوی طور پر ڈاکٹر صاحب کی ہر بات سے متفق ہونا ضروری نہیں اختلاف رائے آپ کا حق ہے
لیکن خدا راہ مسلکی تعصب کی بنیاد پر دشمنان اسلام کا ساتھ مت دیں یاد رکھیں ہم پہلے مسلمان ہیں اور دیوبندی ،بریلوی ، اور اہلحدیث بعد میں ہیں .
🍀 Bismillahir Rahmanir Raheem
⭕ 8 Deadly Traps Of Shaytaan (Satan) - 21st Century Deception........
🔺1. Misbehaving And Not Showing Manners in Front Of Parents And in Society, Having A Smart Aleck Answer For Everything - Its 'Boldness'.😔😔
🔺 2. Act And Promote 'fahisha' (Naked, Nude Behaviour, Open interaction With The Opposite sex) - Its 'Confidence'.😔😔
🔺 3. No Hijaab Needed - Attracting Opposite Gender With Shamelessness - Its 'Beauty Modernity And Fashion'.😔😔
🔺 4. Illicit Actions And Zina ( Adultery, Fornication, Lust )- Its 'Love' 😔😔
🔺 5. Music, Dance ( Like Animals) , Consuming Alcohol And Drugs, Movies - Its 'Entertainment'.😔😔
🔺6. Wasting precious time of life (youth) on useless activities and worst sins possible to commit. - Its 'Chilling out and Needed'.😔😔
🔺 7. To talk against and make mockery of Religion, Scholars, Prophets, Islam - It is Independence and 'Freedom of Speech'.😔😔
🔺 8. Dealing in Ribah (interest) and then arguing on behalf of it and supporting a sin which Allah says people are preparing a war against him and his prophet. - In today's world everyone is taking it, so it's ok 😔😔
🍀 Undoubtedly, we are lost in the materialistic world, the Hour is much nearer, my brothers and sisters..!!
🍀 May Allah keep us away from such traps and guide us to Siraat-e-Mustaqeem.
Aameen Yaa Rabbal 'Aalameen
⭕ 8 Deadly Traps Of Shaytaan (Satan) - 21st Century Deception........
🔺1. Misbehaving And Not Showing Manners in Front Of Parents And in Society, Having A Smart Aleck Answer For Everything - Its 'Boldness'.😔😔
🔺 2. Act And Promote 'fahisha' (Naked, Nude Behaviour, Open interaction With The Opposite sex) - Its 'Confidence'.😔😔
🔺 3. No Hijaab Needed - Attracting Opposite Gender With Shamelessness - Its 'Beauty Modernity And Fashion'.😔😔
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🔺 7. To talk against and make mockery of Religion, Scholars, Prophets, Islam - It is Independence and 'Freedom of Speech'.😔😔
🔺 8. Dealing in Ribah (interest) and then arguing on behalf of it and supporting a sin which Allah says people are preparing a war against him and his prophet. - In today's world everyone is taking it, so it's ok 😔😔
🍀 Undoubtedly, we are lost in the materialistic world, the Hour is much nearer, my brothers and sisters..!!
🍀 May Allah keep us away from such traps and guide us to Siraat-e-Mustaqeem.
Aameen Yaa Rabbal 'Aalameen
UNESCO declares Islam as the most peaceful religion of the world
PARIS:In a major development that should silence critics of Islam who have been blaming it for terrorism, UNESCO has declared that Islam is the most peaceful religion of the world.The United Nations body released a statement earlier today that revealed that UNESCO had partnered with International Peace Foundation six months back to study all religions of the world and find out which was most peaceful amongst all.“After six months of rigorous study and analysis, we have concluded that Islam is the most peaceful religion,” Robert McGee, head of comparative studies wing of International Peace Foundation declared in a press conference that was attended by UNESCO officials too.When asked about the terror attacks being carried out in the name of Islam, including the recent ones in Dhaka and Baghdad, the UNESCO official denied that it had anything to do with Islam.“Terror has no religion,” he said, “Islam means peace.”To document this official recognition, UNESCO will issue certificates to interested Muslim bodies, which can choose to display them at various places like madrasas, Islamic study centers, mosques, halal stores, slaughterhouses, etc.
http://www.juntakareporter.com/world/unesco-declares-islam-as-the-most-peaceful-religion-of-the-world/
PARIS:In a major development that should silence critics of Islam who have been blaming it for terrorism, UNESCO has declared that Islam is the most peaceful religion of the world.The United Nations body released a statement earlier today that revealed that UNESCO had partnered with International Peace Foundation six months back to study all religions of the world and find out which was most peaceful amongst all.“After six months of rigorous study and analysis, we have concluded that Islam is the most peaceful religion,” Robert McGee, head of comparative studies wing of International Peace Foundation declared in a press conference that was attended by UNESCO officials too.When asked about the terror attacks being carried out in the name of Islam, including the recent ones in Dhaka and Baghdad, the UNESCO official denied that it had anything to do with Islam.“Terror has no religion,” he said, “Islam means peace.”To document this official recognition, UNESCO will issue certificates to interested Muslim bodies, which can choose to display them at various places like madrasas, Islamic study centers, mosques, halal stores, slaughterhouses, etc.
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