हमारा ही खून बहाया जाता है हम पर ही आतंकवादी होने का ठप्पा लगाया जाता है। हम अजमेर की दरगाह में मारे जाते हैं हम ही बम फोड़ने के आरोप में गिरफ्तार किये जाते हैं। हम ही मक्का मस्जिद में मारे जाते हैं, हम मालेगांव में भी मारे जाते हैं और हम ही गिरफ्तार भी किये जाते हैं। इराक हो या सीरिया अफगानिस्तान हो या पाकिस्तान बंग्लादेश सब जगह हमारे खून के छींटे हैं सब जगह की सड़कें हमारे ही खून से लाल हुई हैं। और हम पर ही तोहमतें हैं कि हम आतंकवादी हैं। परसों तुर्की में 44 लोग मारे गये कल बंग्लादेश में 20 लोग मार दिये गये आज इराक में 80 लोग मार दिये। किसने मारा है इनको ? क्या मुसलमानों ने ? कौन है आईसिस ? क्या मुसलमानों का संगठन है ? आईसिस को हथियार कौन देता है ? कौन उसके लड़ाको को खाना खिलाता है ? कौन उसके घायल लड़ाकों का इलाज करता है ? कहने को पूरी दुनिया आतंकवाद के खिलाफ है मगर आतंकवाद के नाम पर आतंकित भी हम ही हैं और तमाशा भी हम ही हैं। क्या यह मुसलमानों के खिलाफ अघोषित वैश्विक लड़ाई है ? जिसमें मारे भी मुसलमान जायेंगे और इल्जाम भी मुसलमानों पर होगा।
मैं किसके हाथ पे अपना लहू तलाश करूं तमाम शहर ने पहने हुऐ हैं दस्ताने।
मैं किसके हाथ पे अपना लहू तलाश करूं तमाम शहर ने पहने हुऐ हैं दस्ताने।


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