Monday, July 18, 2016

40 साल पहले एक निराले कोच के चेले का धमाल



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ओलंपिक खेलों में मिल्खा सिंह और गुरबचन सिंह रंधावा के बाद किसी स्पर्धा के फ़ाइनल में पहुंचने का श्रेय अगर किसी को जाता है तो वो हैं श्रीराम सिंह. श्रीराम सिंह ने ये उपलब्धि 1976 के मांट्रियल ओलंपिक में हासिल की थी.
उसके बाद पीटी ऊषा ने 1984 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक खेलों में महिलाओं की 400 मीटर बाधा दौड़ में फ़ाइनल के लिए क्वालीफ़ाई किया था.
भारत के सर्वश्रेष्ठ कोचों में से एक इलियास बाबर के शिष्य श्रीराम सिंह ने उनके कहने पर ही मध्यम दूरी की दौड़ में भाग लेना शुरू किया था.
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श्रीराम सिंह ने 1970 के बैंकाक एशियाई खेलों में रजत और 1974 के एशियाई खेलों में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता था. उन्होंने बीबीसी से बात करते हुए बताया, “मांट्रियल जाने से पहले हमने पटियाला और दिल्ली में काफ़ी ट्रेनिंग की थी. ट्रेनिंग देख कर हमारे कोच इलियास बाबर ने तत्कालीन खेल मंत्री सिकंदर बख़्त से कहा था कि अगर मुझे विदेशों में कुछ अभ्यास करने को मिल जाए तो मैं मेडल जीत कर ला सकता हूँ. लेकिन उनकी बात नहीं मानी गई. सबसे बड़ी बात कि मैं यहाँ सिंडर यानी मिट्टी के ट्रैक में दौड़ कर माँट्रियल गया जहाँ सिंथेटिक ट्रैक पर सारी प्रतियोगिता होनी थी.”


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प्रतियोगिता शुरू होने से कुछ दिन पहले जब श्रीराम सिंह ने एक अभ्यास दौड़ में दुनिया के दिग्गज धावकों को पछाड़ते हुए पहला स्थान प्राप्त किया, तो विश्व खेल पत्रकारों का ध्यान पहली बार उनकी तरफ़ गया. पहली हीट में बहुत तेज़ दौड़ते हुए उन्होंने पहला लैप सिर्फ़ 51.35 सेकेंड में पूरा किया.
अगले 300 मीटर भी वो उसी गति से दौड़ते रहे. लेकिन फिर मांट्रियल में स्वर्ण पदक के सबसे बड़े दावेदार अमरीका के रिचर्ड वॉल ह्यूटर उनसे आगे निकल गए. उनका समय था 1 मिनट 45.7 सेकेंड.
श्रीराम सिंह अपने जीवन की सर्वश्रेष्ठ टाइमिंग के साथ दूसरे नंबर पर आए. उन दिनों को याद करते हुए श्रीराम सिंह कहते हैं, “पहली हीट में हमने देखा कि सभी रनर 1 मिनट 44 या 45 सेंकेंड वाले थे. मेरा उस समय तक सर्वश्रेष्ठ टाइम था 1 मिनट 47 सेकेंड. हमने यही सोचा कि हमारे लिए तो आज ही फ़ाइनल है. सेकेंड राउंड में मैं 1 मिनट 46.2 सेकेंड का समय निकाल कर चौथे स्थान पर आया.”
दूसरे राउंड यानी सेमीफ़ाइनल में श्रीराम सिंह चौथे नंबर पर आकर फ़ाइनल के लिए क्वालीफ़ाई ज़रूर कर गए, लेकिन वो इस दौड़ से बाहर होते होते भी बचे.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने अपने 16 जुलाई, 1976 के अंक में लिखा, “इस दौड़ में श्रीराम सिंह को चौथे स्थान पर संतोष करना पड़ा. दौड़ समाप्त होने से पाँच मीटर पहले अमरीका के जेम्स रॉबिन्सन ने उनसे आगे निकलने के लिए पूरा ज़ोर लगा दिया. हमने सांसें रोक कर स्कोर बोर्ड पर फ़ाइनल नतीजा देखा क्योंकि हमारी नंगी आँखों को लगा था कि शायद अमरीकी ने श्रीराम सिंह को पछाड़ दिया है. लेकिन इलेक्ट्रॉनिक कैमरे ने उन्हें एक सेकेंड के सौंवे हिस्से से आगे दिखाया. इलेक्ट्रॉनिक बोर्ड पर परिणाम देखते ही हम ख़ुशी से उछल पड़े. सबसे ज़्यादा खुश थे श्रीराम सिंह के कोच इलियास बाबर.”
बाबर श्रीराम सिंह का हौसला बढ़ाने अपने ख़र्चे पर मांट्रियल गए थे. उन्होंने अपना स्कूटर बेचा और लोगों से उधार ले कर मांट्रियल का टिकट ख़रीदा. जाने माने खेल पत्रकार और एक ज़माने में बाबर के शिष्य रहे नौरिस प्रीतम बताते हैं कि किस तरह एक दिन में इलियास बाबर का पासपोर्ट बना और वो शेरवानी कुर्ता पहन कर मांट्रियल की फ़्लाइट पर बैठे.



खेल पत्रकार नौरिस प्रीतम ने बताया, “वो एक बार निज़ामुद्दीन की दरगाह पर बैठे हुए थे. मुझे वो ख़लीफ़ा पुकारते थे. मुझसे वो बोले बताओ ख़लीफ़ा श्रीराम कितने में दौड़ेगा? मैंने बहुत डरते हुए कहा शायद 1.47 मिनट के नीचे भाग जाए. उन्होंने छूटते ही कहा बेवकूफ़ हो क्या? वो तो वर्ल्ड रिकार्ड बनाएगा...1.45 भागेगा. मैं ये सोच कर चुप हो गया कि शायद ये फेंक रहे हैं. मैंने कहा कि अगर ऐसा है तो आपको मांट्रियल जाना चाहिए. उन्होंने कहा मैं वहाँ नहीं जाऊंगा.”
नौरिस बताते हैं कि एक दिन आकर उन्होंने खुद ही कहा कि मुझे मांट्रियल जाना है. मैंने कहा कि उसके लिए पासपोर्ट, फ़ॉरेन एक्सचेंज और वीज़ा चाहिए. वो बोले मेरे पास तो कुछ भी नहीं है. तुम बनवाओ. “उन दिनों एक रनर अजय मेहता हमारे साथ दौड़ा करता था. हमें ये पता था कि उसके पिता विदेश मंत्रालय में बड़े पद पर हैं. जब हमने अजय से मदद करने के लिए कहा तो उसने अपने पिता के पास हमें भेज दिया. उनकी तुग़लक रोड पर बड़ी कोठी हुआ करती थी. उनका नाम जगत मेहता था. हमें बाद में मालूम पड़ा कि वो तो भारत के विदेश सचिव हैं.”
नौरिस आगे बताते हैं, “उन्होंने हमें एक नोट लिख कर पासपोर्ट ऑफ़िसर के पास भेज दिया. उन्होंने हमें एक फ़ार्म भरने के लिए दिया. हम बाबर साहब के पास फ़ार्म भरवाने नेशनल स्टेडियम गए. मैंने उनसे कहा फ़ार्म भरिए. उन्होंने कहा तुम्हीं भर दो. वो इन सब चीज़ों से ज़रा कतराते थे. हम फ़ार्म भर कर पासपोर्ट ऑफ़िसर के पास ले गए. मैंने उनसे पूछा कि पासपोर्ट कब तक मिलेगा? उन्होंने अपनी मेज़ की दराज़ खोली और मेरे हाथ में बाबर का पासपोर्ट थमा दिया.”
नौरिस आगे बताते हैं, “जब हम उन्हें एयरपोर्ट छोड़ने गए तो हमने उनसे पूछा कि आपका सामान कहां है? उन्होंने एक छोटे से चमड़े के बैग की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि यही मेरा सामान है. मैंने उनसे पूछा कि इसमें क्या है? उन्होंने कहा इसमें मेरे सौ दो सौ पान हैं. उन्हें पान का बहुत शौक था और ये पता था कि मांट्रियल में उन्हें पान कहीं नहीं मिलेंगे. जिस शेरवानी पायजामे में वो गए थे, उसी में वो पाँच दिन बाद श्रीराम सिंह की तीन दौड़ें देख कर वापस आ गए.”



हीट्स की तरह फ़ाइनल में भी श्रीराम सिंह ने शुरू से ही तेज़ गति रखी. 400 मीटर तक वो सबसे आगे थे और उनका समय था 50.85 सेकेंड. यहाँ तक कि स्वर्ण पदक जीतने वाले अल्बर्टो हुयानतोरीना भी उनसे पीछे दौड़ रहे थे.
बीबीसी से बात करते हुए श्रीराम सिंह ने याद किया, “गुरुजी ने मुझसे कहा था कि तुम्हें अपनी सामान्य दौड़ दौड़नी है. डर कर नहीं भागना है. मैं मेडल के लिए दौड़ना चाह रहा था. उस ओलंपिक में एक नई चीज़ ये थी कि हमें पहले 300 मीटर तक अपनी लेन में दौड़ना था. इससे पहले नियम था कि पहले कर्व के बाद सभी दौड़ने वाले पहली लेन में आ जाते थे. इसकी वजह से भी मुझे दौड़ का सही जजमेंट नहीं हो पाया.”
श्रीराम सिंह ने आगे कहा, “मैं 500 मीटर तक सबसे आगे चल रहा था. उसके बाद हुआनतोरीना मुझसे आगे निकल गया. 600 मीटर के बाद जब तीन लोग मुझसे आगे निकल गए और मैं चौथे नंबर पर था तो मुझे लगा कि मैं पदक की दौड़ से बाहर हो गया. ये सोच कर मैं थोड़ा ढ़ीला पड़ गया. उसके बाद मैं सबसे पीछे हो गया. मैंने फिर ज़ोर लगाया. आख़िर में एक मीटर के अंदर हम सातों ने टेप छुआ. आठवाँ आदमी बहुत पीछे था.”
श्रीराम सिंह 1 मिनट 45.77 सेकेंड का समय निकालने के बाद भी सातवें स्थान पर आए. क्यूबा के अल्बर्तो हुआनतोरीना ने 1 मिनट 43.50 का समय निकालते हुए न सिर्फ़ स्वर्ण पदक जीता बल्कि विश्व रिकार्ड भी बनाया. उस ऐतिहासिक दौड़ को मांट्रियल के मुख्य स्टेडियम में देख रहे थे वरिष्ठ खेल पत्रकार जगन्नाथ राव. वो इस दौड़ को अभी तक नहीं भूल पाए हैं.


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राव बताते हैं, “मुझसे पूछिए तो मैंने किसी भारतीय एथलीट को इस तरह से दौड़ते हुए नहीं देखा फ़ाइनल में. उनसे एक कैलकुलेशन ग़लत हुआ, वो ये कि हुआनतोरीना जो कुछ चाहे वो कर सकता है. 500 मीटर तक तो उन्होंने श्रीराम को आगे दौड़ने दिया, लेकिन वो फिर एकदम से सबसे आगे आगे आ गया. आखिरी 100 मीटर में तो श्रीराम के चेहरे को देख कर लग रहा था कि उन्हें डेथ पैंग्स आ रहे हैं. पता नहीं किस तरह उन्होंने वो दौड़ पूरी की.”
बीबीसी ने श्रीराम सिंह से पूछा कि उस दौड़ के चालीस साल बाद आप सोचते हैं कि अगर आपने उसे दूसरे ढंग से दौड़ा होता तो शायद भारत के लिए पदक आ सकता था?
श्रीराम का जवाब था, “बहुत से लोग कहते हैं कि आपका पहला चक्कर शायद तेज़ हो गया. लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता. अगर आप 50.85 सेकेंड में पहला चक्कर नहीं लगाएंगे तो आप 1 मिनट 45 सेकेंड से नीचे नहीं भाग सकते. पहला चक्कर मेरे हिसाब से ठीक था.”
अपने पिछड़ जाने की वजह के बारे में उन्होंने बताया, “पीछे आने की वजह ये थी कि हम गति की निरंतरता नहीं रख पाए. थकान हो गई और हमें टार्टन ट्रैक पर दौड़ने की ट्रेनिंग नहीं थी. ओलंपिक से पहली रात मैं सोया नहीं. दो दिन विश्व स्तर की दौड़ के बाद पूरा शरीर बुरी तरह से दुख रहा था. ख़ास कर पिंडलियों की मसल्स में बहुत दर्द था. मसाज करने वाला कोई था नहीं. इलाज़ के नाम पर थोड़ा बहुत गर्म पानी से नहा लिए या खुद ही थोड़ी बहुत मसाज कर ली. इन चीज़ों ने मेरे प्रदर्शन पर बहुत असर डाला. दौड़ के बाद हुआनतोरीना मेरे पास आया. उसने मुझे बधाई दी और कहा आपकी वजह से ही मेरा विश्व रिकार्ड बना.”

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